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सोशल मीडिया पर नियंत्रण को लेकर अपने कानून बना रहे हैं ईयू के सदस्य देश

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फ्रांस ने एलान किया है कि वह जल्दी से जल्दी ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स को रेगुलेट करने का कानून पारित कर देगा। उसने इसके लिए कानून उसी तर्ज पर बनाने का फैसला किया है, जिसका सुझाव यूरोपियन यूनियन (ईयू) ने हाल में दिया है। लेकिन उसमें कुछ संशोधन भी प्रस्तावित किए गए हैं। ईयू ने डिजिटल सर्विसेज एक्ट का मसविदा पेश किया है। अब साफ है कि फ्रांस इस मामले में पूरे यूरोप में सहमति बनने का इंतजार करने के मूड में नहीं है। इसके पहले कि पूरे ईयू के लिए डिजिटल सर्विस एक्ट बने, फ्रांस ने अपना अलग कानून बनाने की पहल कर दी है।

फ्रांस के डिजिटल उप मंत्री सेद्रिक ओ ने बीते दिनों कहा कि फ्रांस अपने गणराज्यीय सिद्धांतों के मुताबिक कानून बनाएगा। उन्होंने कहा कि हेट स्पीच से लड़ाई के लिए यह जरूरी है। फ्रांस ने ईयू के प्रस्तावित डिजिटल सर्विस एक्ट में कुछ संशोधन का इरादा जताया है। वह ऐसा प्रावधान करना चाहता है, जिससे कंटेंट निगरानी के मामलों में ऑनलाइन कंपनियों के लिए अधिक पारदर्शिता बरतना अनिवार्य किया जा सके। फ्रांस की मुख्य चिंता ‘रैडिकल इस्लाम’ का मुकाबला करने की है। फ्रांस के बिल पर नेशनल असेंबली में प्रारंभिक चर्चा हो चुकी है। संभावना है कि आने वाले महीनों में इसे पास कर दिया जाएगा। ईयू के कानून के पारित होने में कई साल लग सकते हैं।

फ्रांस के प्रस्ताव में मुख्य जोर निगरानी की जिम्मेदारी तय करने पर है। इसमें यह स्पष्ट प्रावधान करने की कोशिश की गई है कि कंटेंट की निगरानी कहां तक और कैसे हो और इस मामले में कंपनियां कितनी पारदर्शिता बरतें। फ्रांस सबसे बड़ी कंपनियों की अधिक बड़ी जिम्मेदारी तय करना चाहता है। वह ऐसे प्रावधान करना चाहता है जिससे नियमों का उल्लंघन करने पर संबंधित कंपनी के वैश्विक राजस्व के छह फीसदी तक का जुर्माना उन पर लगाया जा सके। किन कंपनियों को बड़ा प्लेटफॉर्म माना जाएगा, उसे परिभाषित करने की पहल भी की गई है। फ्रांस को उम्मीद है कि दिसंबर 2023 तक ईयू का कानून भी इस पूरे इलाके में लागू हो जाएगा। लेकिन जब तक ऐसा नहीं होता, फ्रांस का अपना कानून वहां लागू रहेगा।

ईयू ने कहा है कि फ्रांस जो संशोधन करना चाहता है, उसे उसकी सूचना ईयू की कार्यकारी संस्था को देनी चाहिए। ईयू के प्रवक्ता ने कहा कि ये संस्था यह देखेगी कि क्या फ्रांस के कानून ईयू के प्रस्तावित कानून के अनुरूप है। लेकिन फ्रांस ने अभी तक अपने प्रस्तावित संशोधनों की जानकारी ईयू को नहीं दी है। कुछ ईयू अधिकारियों ने मीडिया से बातचीत में कहा है कि फ्रांस ने ये चाल इसलिए चली है कि वह अपने मॉडल का कानून पूरे ईयू के लिए बनवाना चाहता है।

वैसे फ्रांस अकेला देश नहीं है, जो इस मामले में ईयू के प्रस्तावों से आगे जाकर कदम उठा रहा है। कई और देशों की सरकारें भी अपने राजनीतिक उद्देश्यों के मुताबिक अपने देश में कानून बनाने की पहल कर रही हैं। पोलैंड की सरकार ने पिछले हफ्ते अपने कानून का मसविदा जारी कर दिया। इसमें प्रावधान किया गया है कि गूगल या फेसबुक जैसे प्लेटफॉर्म वैसे कंटेंट को नहीं हटा सकते, जिनसे पोलैंड के किसी कानून का उल्लंघन नहीं होता हो। ऑस्ट्रिया भी ऑनलाइन हेट स्पीच रोकने के लिए अपना कानून बनाने की तरफ बढ़ रहा है। इसमें उससे कहीं ज्यादा प्रकार के कंटेंट को हटाने का प्रावधान है, जैसा आम तौर पर ऑनलाइन कंपनियां हटाती रही हैं।

उधर जर्मनी में पिछले हफ्ते एक ऐसा कानून पारित किया गया, जिससे अधिकारियों को डिजिटल मार्केट में हस्तक्षेप करने के काफी अधिकार मिल गए हैँ। ऐसा प्रावधान ईयू के मसविदे में भी है, लेकिन जर्मनी ने भी उसके कानून बनने तक इंतजार नहीं किया है। इसके अलावा विभिन्न देशों का प्रकाशन उद्योग मांग कर रहा है कि ऑनलाइन कंपनियों को रेगुलेट करने के मामले में अलग-अलग देशों को पूरी आजादी मिलनी चाहिए। प्रकाशन उद्योग जल्द से जल्द इन कंपनियों पर लगाम चाहता है, क्योंकि उनकी वजह से उन्हें आर्थिक नुकसान हो रहा है।

लेकिन इस घटनाक्रम से ईयू की कमजोरी पर रोशनी पड़ी है। इससे यह भी संकेत मिला है कि विभिन्न देश अब साझा कदम उठाने की परवाह नहीं कर रहे हैं। वे तेजी से अपने हितों की रक्षा के लिए अपने कदम उठा रहे हैँ।

सार

फ्रांस की मुख्य चिंता ‘रैडिकल इस्लाम’ का मुकाबला करने की है। फ्रांस के बिल पर नेशनल असेंबली में प्रारंभिक चर्चा हो चुकी है। संभावना है कि आने वाले महीनों में इसे पास कर दिया जाएगा…

विस्तार

फ्रांस ने एलान किया है कि वह जल्दी से जल्दी ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स को रेगुलेट करने का कानून पारित कर देगा। उसने इसके लिए कानून उसी तर्ज पर बनाने का फैसला किया है, जिसका सुझाव यूरोपियन यूनियन (ईयू) ने हाल में दिया है। लेकिन उसमें कुछ संशोधन भी प्रस्तावित किए गए हैं। ईयू ने डिजिटल सर्विसेज एक्ट का मसविदा पेश किया है। अब साफ है कि फ्रांस इस मामले में पूरे यूरोप में सहमति बनने का इंतजार करने के मूड में नहीं है। इसके पहले कि पूरे ईयू के लिए डिजिटल सर्विस एक्ट बने, फ्रांस ने अपना अलग कानून बनाने की पहल कर दी है।

फ्रांस के डिजिटल उप मंत्री सेद्रिक ओ ने बीते दिनों कहा कि फ्रांस अपने गणराज्यीय सिद्धांतों के मुताबिक कानून बनाएगा। उन्होंने कहा कि हेट स्पीच से लड़ाई के लिए यह जरूरी है। फ्रांस ने ईयू के प्रस्तावित डिजिटल सर्विस एक्ट में कुछ संशोधन का इरादा जताया है। वह ऐसा प्रावधान करना चाहता है, जिससे कंटेंट निगरानी के मामलों में ऑनलाइन कंपनियों के लिए अधिक पारदर्शिता बरतना अनिवार्य किया जा सके। फ्रांस की मुख्य चिंता ‘रैडिकल इस्लाम’ का मुकाबला करने की है। फ्रांस के बिल पर नेशनल असेंबली में प्रारंभिक चर्चा हो चुकी है। संभावना है कि आने वाले महीनों में इसे पास कर दिया जाएगा। ईयू के कानून के पारित होने में कई साल लग सकते हैं।

फ्रांस के प्रस्ताव में मुख्य जोर निगरानी की जिम्मेदारी तय करने पर है। इसमें यह स्पष्ट प्रावधान करने की कोशिश की गई है कि कंटेंट की निगरानी कहां तक और कैसे हो और इस मामले में कंपनियां कितनी पारदर्शिता बरतें। फ्रांस सबसे बड़ी कंपनियों की अधिक बड़ी जिम्मेदारी तय करना चाहता है। वह ऐसे प्रावधान करना चाहता है जिससे नियमों का उल्लंघन करने पर संबंधित कंपनी के वैश्विक राजस्व के छह फीसदी तक का जुर्माना उन पर लगाया जा सके। किन कंपनियों को बड़ा प्लेटफॉर्म माना जाएगा, उसे परिभाषित करने की पहल भी की गई है। फ्रांस को उम्मीद है कि दिसंबर 2023 तक ईयू का कानून भी इस पूरे इलाके में लागू हो जाएगा। लेकिन जब तक ऐसा नहीं होता, फ्रांस का अपना कानून वहां लागू रहेगा।

ईयू ने कहा है कि फ्रांस जो संशोधन करना चाहता है, उसे उसकी सूचना ईयू की कार्यकारी संस्था को देनी चाहिए। ईयू के प्रवक्ता ने कहा कि ये संस्था यह देखेगी कि क्या फ्रांस के कानून ईयू के प्रस्तावित कानून के अनुरूप है। लेकिन फ्रांस ने अभी तक अपने प्रस्तावित संशोधनों की जानकारी ईयू को नहीं दी है। कुछ ईयू अधिकारियों ने मीडिया से बातचीत में कहा है कि फ्रांस ने ये चाल इसलिए चली है कि वह अपने मॉडल का कानून पूरे ईयू के लिए बनवाना चाहता है।

वैसे फ्रांस अकेला देश नहीं है, जो इस मामले में ईयू के प्रस्तावों से आगे जाकर कदम उठा रहा है। कई और देशों की सरकारें भी अपने राजनीतिक उद्देश्यों के मुताबिक अपने देश में कानून बनाने की पहल कर रही हैं। पोलैंड की सरकार ने पिछले हफ्ते अपने कानून का मसविदा जारी कर दिया। इसमें प्रावधान किया गया है कि गूगल या फेसबुक जैसे प्लेटफॉर्म वैसे कंटेंट को नहीं हटा सकते, जिनसे पोलैंड के किसी कानून का उल्लंघन नहीं होता हो। ऑस्ट्रिया भी ऑनलाइन हेट स्पीच रोकने के लिए अपना कानून बनाने की तरफ बढ़ रहा है। इसमें उससे कहीं ज्यादा प्रकार के कंटेंट को हटाने का प्रावधान है, जैसा आम तौर पर ऑनलाइन कंपनियां हटाती रही हैं।

उधर जर्मनी में पिछले हफ्ते एक ऐसा कानून पारित किया गया, जिससे अधिकारियों को डिजिटल मार्केट में हस्तक्षेप करने के काफी अधिकार मिल गए हैँ। ऐसा प्रावधान ईयू के मसविदे में भी है, लेकिन जर्मनी ने भी उसके कानून बनने तक इंतजार नहीं किया है। इसके अलावा विभिन्न देशों का प्रकाशन उद्योग मांग कर रहा है कि ऑनलाइन कंपनियों को रेगुलेट करने के मामले में अलग-अलग देशों को पूरी आजादी मिलनी चाहिए। प्रकाशन उद्योग जल्द से जल्द इन कंपनियों पर लगाम चाहता है, क्योंकि उनकी वजह से उन्हें आर्थिक नुकसान हो रहा है।

लेकिन इस घटनाक्रम से ईयू की कमजोरी पर रोशनी पड़ी है। इससे यह भी संकेत मिला है कि विभिन्न देश अब साझा कदम उठाने की परवाह नहीं कर रहे हैं। वे तेजी से अपने हितों की रक्षा के लिए अपने कदम उठा रहे हैँ।

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