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सैन्य तख्तापलटः म्यांमार में फैलते डर के बावजूद अडिग हैं लोकतंत्र समर्थक आंदोलनकारी

म्यांमार में प्रदर्शन
– फोटो : सोशल मीडिया

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म्यांमार में सैनिक शासन के खिलाफ जन प्रदर्शनों का दौर जारी है, लेकिन अब प्रदर्शनकारियों पर सरकारी कार्रवाई अधिक सख्त होती जा रही है। सैन्य तख्ता पलट के साथ ही देश में जन प्रदर्शनों का सिलसिला शुरू हो गया था। लोगों ने इस दौरान अपना विरोध जताने के लिए बर्तन और ढोल बजाने, जुलूस निकालने और तरह- तरह के निशानों को लहराने के तरीके अपनाए हैं। इनके अलावा बहुत से सरकारी और कई कारखानों के कर्मचारियों ने हड़ताल करके विरोध प्रदर्शनों में हिस्सा लिया है। लेकिन अमेरिकी टीवी चैनल सीएनएन की एक रिपोर्ट के मुताबिक अब विरोध प्रदर्शनों के आयोजकों में भय फैलता जा रहा है।

शनिवार को म्यांमार ने सुरक्षा बलों ने एक स्थान पर जमा हुए प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के लिए गोलियां चला दीं। जानकारी के अनुसार इस घटना में कई लोग घायल हुए हैं और एक व्यक्ति की मौत हो गई है।

पूरे म्यांमार में रात आठ बजे से सुबह चार बजे तक रात का कर्फ्यू लगा दिया जाता है। इसके अलावा इंटरनेट की सेवाएं अभी भी बंद हैं। रात में कई जगहों पर सैनिक लोगों को उनके बिस्तरों से खींच कर ले गए हैं। सुबह- सुबह सैनिक शासकों के विरोधियों के घरों पर छापे मारे जा रहे हैं। इस तरह काफी संख्या में लोगों को हिरासत में लिया गया है। इन लोगों पर अस्पष्ट धाराओं के तहत मामले दर्ज किए गए हैं।

सीएनएन की रिपोर्ट के मुताबिक इस कारण प्रदर्शनों के ज्यादातर आयोजक रात अपने घर पर नहीं गुजार रहे हैं। कई बार पूरी उनकी रात छिपने की जगह तलाशते हुए गुजर जाती है। 29 वर्षीय मानव अधिकार कार्यकर्ता थिनजार शुनलेई यी ने सीएनएन से कहा- ‘यह मानसिक और शारीरिक- दोनों स्तरों पर संघर्ष है। हर रोज हमें यह नहीं मालूम रहता कि आज की रात क्या होगा।’ थिनजार शुनलेई यी ने कहा कि नई पीढ़ी लोकतंत्र का अनुभव कर चुकी है और वह नहीं चाहती कि यह उनके हाथ से निकल जाए। इसलिए वे ये लड़ाई लड़ रहे हैं। नौजवानों को पिछली पीढ़ियों के लोगों का भी समर्थन मिल रहा है, जिन्हें मालूम है कि सैनिक शासन का मतलब क्या होता है।

म्यामांर में सेना ने एक फरवरी को तड़के सत्ता हथिया ली थी। उसके कुछ घंटों के बाद ही नव- निर्वाचित संसद की पहली बैठक होने वाली थी। तख्ता पलट करने वाले सैन्य अफसरों ने कहा कि पिछले चुनाव में धांधली हुई थी, इसलिए उन्हें तख्ता पलट का कदम उठाना पड़ा। लेकिन जिस बड़े पैमाने पर पिछले 20 दिन में जन प्रदर्शन हुए हैं, उससे साफ है कि देश के जनमत ने सैन्य शासकों के दावे को ठुकरा दिया है।

सीएनएन के मुताबिक जिन लोगों को अधिकारी शुरुआत में ही उठा ले गए, उनमें बर्मी लेखक और इतिहास के प्रोफेसर मुआंग थार चो भी हैं। मुआंग नौजवानों में काफी लोकप्रिय हैं। उनके दिए भाषण यूट्यूब और दूसरे सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म्स पर मौजूद हैं, जिन्हें हजारों की संख्या में लोगों ने सुना है। मुआंग को ले जाने वाले अधिकारियों ने उनके परिजनों से कहा था कि वे उनसे बातचीत के लिए उन्हें अपने साथ ले जा रहे हैं और उनका पूरा ख्याल रखा जाएगा। लेकिन उन अधिकारियों ने अपना कोई परिचय नहीं बताया। परिजनों के मुताबिक दो और तीन फरवरी को मुआंग ने उन्हें फोन किया था। उसके बाद से उनका कोई पता नहीं है।

मुआंग जैसा व्यवहार अनेक लोगों के साथ हुआ है और ऐसे मामले लगातार बढ़ रहे हैं। इसके बावजूद नौजवान विरोध आयोजन पर अडिग हैं। जानकारों का कहना है कि 1988 (जब सेना ने पिछली बार सत्ता हथियाई थी) और इस बार में फर्क यह है कि अब आज की पीढ़ी को लोकतंत्र का तजुर्बा हो चुका है। साथ ही आज की पीढ़ी अधिक पढ़ी- लिखी और जागरूक है। इसलिए ये लोग लोकतंत्र वापसी के लिए संघर्ष को आगे बढ़ा रहे हैँ।

सीएनएन की रिपोर्ट में ऐसे कई प्रदर्शनकारियों का जिक्र है, जिन्होंने अपना नाम ना बताने की शर्ते पर उसके संवाददाता से बातचीत की। इनमें एक ऐसी महिला प्रदर्शनकारी भी शामिल हैं, जिन्होंने लोकतंत्र के लिए संघर्ष में भागीदारी के मकसद से बिजनेस डेवलपमेंट मैनेजर की अपनी नौकरी छोड़ दी है। उन्होंने कहा- ‘अब सब कुछ जनता के हाथ में है। वे लोकतंत्र का स्पर्श कर रहे हैं। हमारे देश में अभी लोकतंत्र की शुरुआत ही हुई थी। यह अभी आरंभिक चरण में था। इंटरनेट पर रोक के बावजूद लोग संगठित हो रहे हैं। हम उस तरह संगठित हो रहे हैं, जैसे लोग फेसबुक, ट्विटर के पहले के युगों में होते थे।’

म्यांमार में सैनिक शासन के खिलाफ जन प्रदर्शनों का दौर जारी है, लेकिन अब प्रदर्शनकारियों पर सरकारी कार्रवाई अधिक सख्त होती जा रही है। सैन्य तख्ता पलट के साथ ही देश में जन प्रदर्शनों का सिलसिला शुरू हो गया था। लोगों ने इस दौरान अपना विरोध जताने के लिए बर्तन और ढोल बजाने, जुलूस निकालने और तरह- तरह के निशानों को लहराने के तरीके अपनाए हैं। इनके अलावा बहुत से सरकारी और कई कारखानों के कर्मचारियों ने हड़ताल करके विरोध प्रदर्शनों में हिस्सा लिया है। लेकिन अमेरिकी टीवी चैनल सीएनएन की एक रिपोर्ट के मुताबिक अब विरोध प्रदर्शनों के आयोजकों में भय फैलता जा रहा है।

शनिवार को म्यांमार ने सुरक्षा बलों ने एक स्थान पर जमा हुए प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के लिए गोलियां चला दीं। जानकारी के अनुसार इस घटना में कई लोग घायल हुए हैं और एक व्यक्ति की मौत हो गई है।

पूरे म्यांमार में रात आठ बजे से सुबह चार बजे तक रात का कर्फ्यू लगा दिया जाता है। इसके अलावा इंटरनेट की सेवाएं अभी भी बंद हैं। रात में कई जगहों पर सैनिक लोगों को उनके बिस्तरों से खींच कर ले गए हैं। सुबह- सुबह सैनिक शासकों के विरोधियों के घरों पर छापे मारे जा रहे हैं। इस तरह काफी संख्या में लोगों को हिरासत में लिया गया है। इन लोगों पर अस्पष्ट धाराओं के तहत मामले दर्ज किए गए हैं।

सीएनएन की रिपोर्ट के मुताबिक इस कारण प्रदर्शनों के ज्यादातर आयोजक रात अपने घर पर नहीं गुजार रहे हैं। कई बार पूरी उनकी रात छिपने की जगह तलाशते हुए गुजर जाती है। 29 वर्षीय मानव अधिकार कार्यकर्ता थिनजार शुनलेई यी ने सीएनएन से कहा- ‘यह मानसिक और शारीरिक- दोनों स्तरों पर संघर्ष है। हर रोज हमें यह नहीं मालूम रहता कि आज की रात क्या होगा।’ थिनजार शुनलेई यी ने कहा कि नई पीढ़ी लोकतंत्र का अनुभव कर चुकी है और वह नहीं चाहती कि यह उनके हाथ से निकल जाए। इसलिए वे ये लड़ाई लड़ रहे हैं। नौजवानों को पिछली पीढ़ियों के लोगों का भी समर्थन मिल रहा है, जिन्हें मालूम है कि सैनिक शासन का मतलब क्या होता है।

म्यामांर में सेना ने एक फरवरी को तड़के सत्ता हथिया ली थी। उसके कुछ घंटों के बाद ही नव- निर्वाचित संसद की पहली बैठक होने वाली थी। तख्ता पलट करने वाले सैन्य अफसरों ने कहा कि पिछले चुनाव में धांधली हुई थी, इसलिए उन्हें तख्ता पलट का कदम उठाना पड़ा। लेकिन जिस बड़े पैमाने पर पिछले 20 दिन में जन प्रदर्शन हुए हैं, उससे साफ है कि देश के जनमत ने सैन्य शासकों के दावे को ठुकरा दिया है।


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प्रदर्शनकारी मुआंग हुए लापता

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