Breaking News

‘विकास’ की आंधी में उजड़ी पंजाब की खेती, हरियाली से दूर हुए किसान

पढ़ें अमर उजाला ई-पेपर
कहीं भी, कभी भी।

*Yearly subscription for just ₹299 Limited Period Offer. HURRY UP!

ख़बर सुनें

पंजाब सदियों से कृषि प्रधान राज्य का गौरव पाता रहा है। यह क्षेत्र अपने प्राकृतिक जलस्रोतों, उपजाऊ भूमि और संजीवनी हवाओं के कारण जाना जाता था। बंटवारे के बाद ढाई दरिया छीने जाने के बावजूद बचे ढाई दरियाओं वाले प्रदेश ने देश के अन्न भंडार को समृद्ध किया है। गुरुवाणी में बीजाई को शुभ कारज (कार्य) के साथ-साथ बुनियादी कारज भी कहा गया है। पंजाब का सारा आर्थिक और सामाजिक इतिहास खेती-किसानी के इर्द-गिर्द घूमता रहा है। आर्थिक मंदी के दौर में यहां की किसानी भी बनती-बिगड़ती रही है। ‘पगड़ी संभाल जट्टा’ ऐसे ही आर्थिक संकट से उपजी लहर थी। संकटों के दौर में भी पंजाब के किसानों ने अपनी खेती को मरजीवड़ों की तरह संभाल कर रखा। ऐसे स्वभाव के पीछे श्री गुरुनानक देव जी की वह चेतना भी थी, जिसमें तमाम यात्राओं के बाद करतारपुर में उन्होंने स्वयं खेती की थी। उन्होंने बड़ा संदेश यही दिया कि ‘किरत (कृषि, कर्म) करो,  वंड छको (बांटकर खाओ) और नाम जपो।’ उन्होंने कृषि-कर्म और बांटकर खाने को नाम से भी ऊपर रखा। ऐसे रुहानी एहसास के इतिहास के कारण ही पंजाब में सदियों से परमार्थी वातावरण बनता चला गया। पर आज जिस तथाकथित विकास ने गुरु चरणों की रज धूमिल की, उसकी कीमत पंजाब की किसानी को चुकानी पड़ रही है।

पंजाब में पिछले करीब पांच दशक से आर्थिक विकास की आंधी चली है। बदले फसल चक्र की आपाधापी में आए पैसे की हरियाली ने किसानों को दैवी हरियाली से दूर कर दिया। उन्होंने ‘हरित क्रांति’ के मामूली से सट्टे में खेती-किसानी के सनातन मूल्य गंवाए और गुरु के बचन भी बिसरा दिए। पंजाब ने पिछले पांच दशकों में कीटनाशकों का इतना अधिक इस्तेमाल किया कि पूरी धरती को ही तंदूर बना डाला है। कृषि विश्वविद्यालय, लुधियाना के विशेषज्ञ लिखते हैं कि पंजाब के 40 फीसदी छोटे किसान या तो समाप्त हो चुके हैं या अपने ही बिक चुके खेतों में मजदूरी करने को मजबूर हैं।

पंजाब के 12,644 गांवों में प्रतिवर्ष 10 से 15 परिवार उजड़ रहे हैं। किताबी कृषि पढ़ाने वाले प्रोफेसरों की तनख्वाहें बढ़ती चली गईं और पंजाब के खेतों में फाके का खर-पतवार लगातार उगता चला गया। नए बीज, नई फसलें, अजीबो-गरीब खाद, कीड़े मार दवाएं, भयंकर किस्म का मशीनीकरण और आंखों में धूल झोंकने वाले प्रचार ने किसानों का भविष्य अंधेरी गुफा में झोंक दिया है। पंजाब के अधिकतर गांव मरने की कगार पर हैं। सेहत, शिक्षा, आवाजाही और साफ-सफाई की सुविधाएं भी मात्र शहर और कस्बा केंद्रित कर दी गई हैं।

लालच पर केंद्रित किसानी के कारण बेहद समृद्ध लोकजीवन भी छिन्न-भिन्न हो चला है। धान कभी पंजाब की फसल नहीं रही। पर पैसे के लालच और दूसरे राज्यों के लिए अधिक से अधिक चावल बेचने के मोह ने किसानी के फसल चक्र को उल्टा चला दिया। धान का उत्पादन इतना बढ़ा कि सड़ने तक लगा। अधिक उत्पादन के कारण चोरी के नए-नए तरीके ईजाद हुए। सरकारी गोदामों में धान की बोरियां सड़ाने के लिए विशेष तौर पर सब्मर्सिबल पंप लगाए गए। इससे शैलर मालिक और अधिकारियों की तिजोरियां भरती गईं, किसान का खीसा फटता गया। दूसरे राज्यों से मजदूरों से भरी गाड़ियां आने लगीं। मेहनती माना जाने वाला किसान अब मेहनत से भी दूर होने लगा। शराब का नशा बेशक पहले से था ही, उसमें अब चिट्टे समेत और भी छोटे-बड़े नशे जुड़ गए हैं। ऐसे में, एड्स, दीगर बीमारियां, लूटमार, छीना-झपटी की घटनाएं बढ़ने लगी हैं। लोग नशे के लिए भी कर्ज लेने लगे हैं।

भयंकर उत्पादन और पैसे की पहली खेप से सबसिडी, सस्ते कर्ज वगैरह के कारण सब्मर्सिबलों और ट्रैक्टरों की कंपनियां सरकारी शरण लेकर हर शहर में बिछ गईं। देखते ही देखते 12,644 गांवों में 15.5 लाख सब्मर्सिबल धंसा दिए गए। कुछ ही साल में भूजल 20 से 250 फुट नीचे चला गया। इन सब्मर्सिबल पंपों के लिए जहां कुछ बरस पहले पांच हॉर्स पावर की मोटर काम करती थी, वहीं आज 15 से 20 हॉर्स-पावर की मोटर जरूरी हो चली है। सबसे बड़ा नुकसान चरागाहों का समाप्त होना है। बांझ पशुओं से दवाओं के सहारे लिए जाने वाले दूध के कारण महिलाओं में भी बांझपन के मामले सामने आने लगे हैं। पहले शहरीकरण और अब वैश्वीकरण ने पंजाब को काल का ग्रास बनने के कगार पर ला खड़ा किया है। पंजाब दुनिया का पहला राज्य होगा, जहां से ‘कैंसर एक्सप्रेस’ चलती है। जिस राजस्थान के साथ पंजाब पानी का एक घड़ा बांटने को तैयार नहीं, उसी राजस्थान का बीकानेर पंजाब के कैंसर मरीजों को मुफ्त इलाज देता है। बड़े सरकारी अधिकारी और कृषि विशेषज्ञ अब बचे-खुचे पंजाब को भी उजाड़ने की तैयारियों में जुटे हैं। कृषि उत्पादों को विश्व बाजार में ले जाने का एक नया सपना और बोया जा रहा है। पंजाब की बची-खुची उपजाऊ जमीन पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों और देशी धन्ना सेठों का हल्ला जारी है। पंजाब की खेती-किसानी आज ऐसी दौड़ में है, जिसमें वह अपनी अगली पीढ़ी लगभग गंवा चुकी है। वहां अनेक गांव ऐसे हैं, जहां मात्र बुजुर्ग बचे हैं। बच्चे सब विदेश जा चुके हैं।

पंजाब के नाम में जुड़े शब्द आब का एक अर्थ पानी है, तो इसका दूसरा गहरा अर्थ है : चमक, इज्जत और आबरू। अगर हमें पंजाब की इज्जत-आबरू फिर से हासिल करनी है, तो प्रकृति के खिलाफ जाने वाले तथाकथित विकास को तिलांजलि देकर गुरुओं, फकीरों के ज्ञान और परंपराओं की थाती को नजीर मानकर उस पर चलना होगा। तभी खेती बचेगी, जवानी बचेगी, किसानी बचेगी और कुल मिलाकर पंजाब बचेगा।

पंजाब सदियों से कृषि प्रधान राज्य का गौरव पाता रहा है। यह क्षेत्र अपने प्राकृतिक जलस्रोतों, उपजाऊ भूमि और संजीवनी हवाओं के कारण जाना जाता था। बंटवारे के बाद ढाई दरिया छीने जाने के बावजूद बचे ढाई दरियाओं वाले प्रदेश ने देश के अन्न भंडार को समृद्ध किया है। गुरुवाणी में बीजाई को शुभ कारज (कार्य) के साथ-साथ बुनियादी कारज भी कहा गया है। पंजाब का सारा आर्थिक और सामाजिक इतिहास खेती-किसानी के इर्द-गिर्द घूमता रहा है। आर्थिक मंदी के दौर में यहां की किसानी भी बनती-बिगड़ती रही है। ‘पगड़ी संभाल जट्टा’ ऐसे ही आर्थिक संकट से उपजी लहर थी। संकटों के दौर में भी पंजाब के किसानों ने अपनी खेती को मरजीवड़ों की तरह संभाल कर रखा। ऐसे स्वभाव के पीछे श्री गुरुनानक देव जी की वह चेतना भी थी, जिसमें तमाम यात्राओं के बाद करतारपुर में उन्होंने स्वयं खेती की थी। उन्होंने बड़ा संदेश यही दिया कि ‘किरत (कृषि, कर्म) करो,  वंड छको (बांटकर खाओ) और नाम जपो।’ उन्होंने कृषि-कर्म और बांटकर खाने को नाम से भी ऊपर रखा। ऐसे रुहानी एहसास के इतिहास के कारण ही पंजाब में सदियों से परमार्थी वातावरण बनता चला गया। पर आज जिस तथाकथित विकास ने गुरु चरणों की रज धूमिल की, उसकी कीमत पंजाब की किसानी को चुकानी पड़ रही है।

पंजाब में पिछले करीब पांच दशक से आर्थिक विकास की आंधी चली है। बदले फसल चक्र की आपाधापी में आए पैसे की हरियाली ने किसानों को दैवी हरियाली से दूर कर दिया। उन्होंने ‘हरित क्रांति’ के मामूली से सट्टे में खेती-किसानी के सनातन मूल्य गंवाए और गुरु के बचन भी बिसरा दिए। पंजाब ने पिछले पांच दशकों में कीटनाशकों का इतना अधिक इस्तेमाल किया कि पूरी धरती को ही तंदूर बना डाला है। कृषि विश्वविद्यालय, लुधियाना के विशेषज्ञ लिखते हैं कि पंजाब के 40 फीसदी छोटे किसान या तो समाप्त हो चुके हैं या अपने ही बिक चुके खेतों में मजदूरी करने को मजबूर हैं।

पंजाब के 12,644 गांवों में प्रतिवर्ष 10 से 15 परिवार उजड़ रहे हैं। किताबी कृषि पढ़ाने वाले प्रोफेसरों की तनख्वाहें बढ़ती चली गईं और पंजाब के खेतों में फाके का खर-पतवार लगातार उगता चला गया। नए बीज, नई फसलें, अजीबो-गरीब खाद, कीड़े मार दवाएं, भयंकर किस्म का मशीनीकरण और आंखों में धूल झोंकने वाले प्रचार ने किसानों का भविष्य अंधेरी गुफा में झोंक दिया है। पंजाब के अधिकतर गांव मरने की कगार पर हैं। सेहत, शिक्षा, आवाजाही और साफ-सफाई की सुविधाएं भी मात्र शहर और कस्बा केंद्रित कर दी गई हैं।

लालच पर केंद्रित किसानी के कारण बेहद समृद्ध लोकजीवन भी छिन्न-भिन्न हो चला है। धान कभी पंजाब की फसल नहीं रही। पर पैसे के लालच और दूसरे राज्यों के लिए अधिक से अधिक चावल बेचने के मोह ने किसानी के फसल चक्र को उल्टा चला दिया। धान का उत्पादन इतना बढ़ा कि सड़ने तक लगा। अधिक उत्पादन के कारण चोरी के नए-नए तरीके ईजाद हुए। सरकारी गोदामों में धान की बोरियां सड़ाने के लिए विशेष तौर पर सब्मर्सिबल पंप लगाए गए। इससे शैलर मालिक और अधिकारियों की तिजोरियां भरती गईं, किसान का खीसा फटता गया। दूसरे राज्यों से मजदूरों से भरी गाड़ियां आने लगीं। मेहनती माना जाने वाला किसान अब मेहनत से भी दूर होने लगा। शराब का नशा बेशक पहले से था ही, उसमें अब चिट्टे समेत और भी छोटे-बड़े नशे जुड़ गए हैं। ऐसे में, एड्स, दीगर बीमारियां, लूटमार, छीना-झपटी की घटनाएं बढ़ने लगी हैं। लोग नशे के लिए भी कर्ज लेने लगे हैं।

भयंकर उत्पादन और पैसे की पहली खेप से सबसिडी, सस्ते कर्ज वगैरह के कारण सब्मर्सिबलों और ट्रैक्टरों की कंपनियां सरकारी शरण लेकर हर शहर में बिछ गईं। देखते ही देखते 12,644 गांवों में 15.5 लाख सब्मर्सिबल धंसा दिए गए। कुछ ही साल में भूजल 20 से 250 फुट नीचे चला गया। इन सब्मर्सिबल पंपों के लिए जहां कुछ बरस पहले पांच हॉर्स पावर की मोटर काम करती थी, वहीं आज 15 से 20 हॉर्स-पावर की मोटर जरूरी हो चली है। सबसे बड़ा नुकसान चरागाहों का समाप्त होना है। बांझ पशुओं से दवाओं के सहारे लिए जाने वाले दूध के कारण महिलाओं में भी बांझपन के मामले सामने आने लगे हैं। पहले शहरीकरण और अब वैश्वीकरण ने पंजाब को काल का ग्रास बनने के कगार पर ला खड़ा किया है। पंजाब दुनिया का पहला राज्य होगा, जहां से ‘कैंसर एक्सप्रेस’ चलती है। जिस राजस्थान के साथ पंजाब पानी का एक घड़ा बांटने को तैयार नहीं, उसी राजस्थान का बीकानेर पंजाब के कैंसर मरीजों को मुफ्त इलाज देता है। बड़े सरकारी अधिकारी और कृषि विशेषज्ञ अब बचे-खुचे पंजाब को भी उजाड़ने की तैयारियों में जुटे हैं। कृषि उत्पादों को विश्व बाजार में ले जाने का एक नया सपना और बोया जा रहा है। पंजाब की बची-खुची उपजाऊ जमीन पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों और देशी धन्ना सेठों का हल्ला जारी है। पंजाब की खेती-किसानी आज ऐसी दौड़ में है, जिसमें वह अपनी अगली पीढ़ी लगभग गंवा चुकी है। वहां अनेक गांव ऐसे हैं, जहां मात्र बुजुर्ग बचे हैं। बच्चे सब विदेश जा चुके हैं।

पंजाब के नाम में जुड़े शब्द आब का एक अर्थ पानी है, तो इसका दूसरा गहरा अर्थ है : चमक, इज्जत और आबरू। अगर हमें पंजाब की इज्जत-आबरू फिर से हासिल करनी है, तो प्रकृति के खिलाफ जाने वाले तथाकथित विकास को तिलांजलि देकर गुरुओं, फकीरों के ज्ञान और परंपराओं की थाती को नजीर मानकर उस पर चलना होगा। तभी खेती बचेगी, जवानी बचेगी, किसानी बचेगी और कुल मिलाकर पंजाब बचेगा।

Source link

arvind007

News Media24 is a Professional News Platform. Here we will provide you National, International, Entertainment News, Gadgets updates, etc. 

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
%d bloggers like this: