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महामारी का दुष्प्रभावः बच्चों के हाथ आए मोबाइल ने बिगाड़ी आदत, अभिभावक परेशान

घर की सीढ़ियों पर बैठकर मोबाइल फोन पर गेम खेलते बच्चे।
– फोटो : PTI

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कोरोना महामारी ने आर्थिक, सामाजिक क्षेत्र में बड़ा बदलाव किया। इसके कारण पैदा हुई परिस्थिति का सबसे अधिक शिकार छोटे बच्चे हो गए हैं। इन बच्चों में सबसे ज्यादा दुष्प्रभाव बच्चों पर पड़ा है। मोहित शर्मा छोटे बच्चों के मामले में परामर्श सेवाएं देते हैं। बताते हैं कि बच्चे अब घर में कुछ सबसे ज्यादा ढूंढ रहे हैं तो वह है इंटरनेट वाला मोबाइल फोन। पिछले 10 महीने में बच्चों को मोबाइल फोन पर गेम खेलने की लत लग गई है। वह छिपकर घर में मोबाइल देख रहे हैं। अभिभावकों के लिए यह काफी बड़ा सिर दर्द बन रहा है।

रोहित धुप्पड़ की सुनिए। किताब की दुकान पर मिले रोहित बताते हैं कि उनके मोबाइल पर अपने एक मोबाइल फोन से फेसबुक मैसेंजर पर पहले कुछ पंजाबी, भोजपुरी गाने आने शुरू हुए। उन्होंने एक दो बार इस पर जवाबी संदेश भी दिया, लेकिन एक दिन वह हतप्रभ रह गए। बताते हैं फेसबुक मैसेंजर पर अश्लील वीडियो क्लिप आई। जब क्लिप दो-तीन बार आई तो उन्होंने अपने रिश्तेदार से बात की। रिश्तेदार बिल्कुल अनजान थे। दो-तीन दिन में उनके रिश्तेदार ने ध्यान देने के बाद बताया कि ऐसा उनके तीसरी कक्षा में नामी स्कूल में पढ़ने वाले 7 साल के बच्चे ने किया था। धुप्पड़ का कहना है कि अब उनके रिश्तेदार अपने बच्चे को लगातार निगरानी में रख रहे हैं।

 

सर्वोदय विद्यालय में शिक्षक मयंक कहते हैं बच्चों को इंटरनेट वाला मोबाइल फोन देना ही खतरनाक है, लेकिन कोरोना के दौर में यह सबसे बड़ी मजबूरी भी है। बच्चों को मोबाइल फोन एप के जरिए ही शिक्षा दी जा सकी है। दिल्ली के एक नामी पब्लिक स्कूल के लिए सूचना प्रौद्योगिकी की सेवाएं देने वाले सूत्र का कहना है कि कोरोना काल में ऑन लाइन शिक्षा के लिए मोबाइल या टैबलेट सबसे उपयुक्त रहे। सूत्र का कहना है कि तमाम घरों में एक से अधिक बच्चे हैं। सभी के लिए लैपटॉप या डेस्कटॉप की उपलब्धता भी हो पाना संभव नहीं है। जबकि मोबाइल या लैपटॉप की तुलना में डेस्कटॉप या लैपटॉप से पढ़ाई ज्यादा अच्छी है। स्क्रीन बड़ी होने के कारण अभिभावक भी आते-जाते देख सकते हैं, लेकिन कई एप ऐसे हैं जो डेस्कटॉप या लैपटॉप पर परफार्म ही नहीं करते। इसलिए बच्चों को मोबाइल फोन देना मजबूरी हो गई। अब इसके दुष्प्रभाव से जुड़ी शिकायतें भी आ रही हैं।

 

केन्द्रीय विद्यालय के शिक्षक यूएस मिश्रा कहते हैं कि आनलाइन पढ़ाई जारी रखने के लिए कोई और जरिया था ही नहीं। किसे पता था कि कोरोना जैसा संक्रमण आएगा। मिश्रा का कहना है कि मोबाइल फोन सबको आकर्षित कर रहा है। बच्चों को भी कर रहा है। अभिभावकों की शिकायते हैं, लेकिन स्कूल खुलने के बाद कुछ समय में सब कुछ ठीक हो जाएगा। मिश्रा का कहना है कि कोरोना काल में खासकर महानगरों में बच्चों का अपने दोस्तों से मिलने-जुलने, उनके साथ खेलने की स्थिति नहीं बन पाई। शारीरिक श्रम वाले खेल भी नहीं खेल पाए। महानगरों में यह दिक्कत ज्यादा हुई। बच्चे छोटे घर, फ्लैट में बंधे रह गए और टीवी, मोबाइल ही मनोरंजन का साधन थे। मिश्रा कहते हैं कि समय भी दस महीने का हो गया तो मां-बाप भी धीरे-धीरे निगरानी करना छोड़ दिए। इसलिए लोगों को दिक्कत हो रही है। मिश्रा का कहना है कि स्कूल खुलने वाले हैं और मुझे लग रहा है कि धीरे-धीरे सब सामान्य हो जाएगा।

वशिष्ठ नारायण पाठक दिल्ली में ही काउंसलर पद से रिटायर हुए हैं। उनका कहना है कि छोटे-बड़े सभी बच्चों में मोबाइल फोन की लत पड़ी होगी। यह स्वाभाविक है। आजकल स्कूलों में कक्षा छह-सात के बच्चे फोन लेकर आने लगे हैं। अच्छे पब्लिक स्कूलों में पढऩे वाले बच्चों के पास शिकायत ज्यादा सुनने में आती है। पाठक का कहना है कि छोटे बच्चे तो कुछ दिन बाद नई व्यवस्था में आसानी से ढल जाते हैं, लेकिन जो बच्चे 9वीं, 10 वीं, 11 वीं, 12वीं की कक्षाओं में पढ़ रहे हैं, उन पर अभिभावकों को ध्यान देना चाहिए, क्योंकि बनने और बिगडऩे दोनों की उम्र भी यही होती है।

सार

-छोटे बच्चों को लेकर कई अभिभावकों को लेनी पड़ी काउंसलर की मदद
-काउंसलर बोले-स्कूल खुलेगा तो सब ठीक हो जाएगा

विस्तार

कोरोना महामारी ने आर्थिक, सामाजिक क्षेत्र में बड़ा बदलाव किया। इसके कारण पैदा हुई परिस्थिति का सबसे अधिक शिकार छोटे बच्चे हो गए हैं। इन बच्चों में सबसे ज्यादा दुष्प्रभाव बच्चों पर पड़ा है। मोहित शर्मा छोटे बच्चों के मामले में परामर्श सेवाएं देते हैं। बताते हैं कि बच्चे अब घर में कुछ सबसे ज्यादा ढूंढ रहे हैं तो वह है इंटरनेट वाला मोबाइल फोन। पिछले 10 महीने में बच्चों को मोबाइल फोन पर गेम खेलने की लत लग गई है। वह छिपकर घर में मोबाइल देख रहे हैं। अभिभावकों के लिए यह काफी बड़ा सिर दर्द बन रहा है।


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बच्चों ने मां-बाप और रिश्तेदारों को भी चौंकाया

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