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बाइडन के दौर में भी चीन के प्रति सख्त ही रहेगी अमेरिका की नीति

वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, टोक्यो
Updated Thu, 21 Jan 2021 04:19 PM IST

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जो बाइडन के अमेरिका का राष्ट्रपति बन जाने के बाद एशिया-प्रशांत क्षेत्र में इस बात के कयास बढ़ गए हैं कि अब क्षेत्र में अमेरिकी नीतियों में क्या बदलाव आएगा। जो बाइडन ने चुनाव जीतने के बाद कहा था- अमेरिका इज बैक (यानी डोनाल्ड ट्रंप के चार साल के मनमौजी और अस्थिर नीतियों वाले कार्यकाल के बाद अब अमेरिका पुराने रूप में फिर से दुनिया के सामने होगा।) बाइडन की टीम ने आश्वासन दिया है कि अमेरिका दुनिया में फिर से नेतृत्वकारी भूमिका निभाएगा। ऐसा वह सहयोगी देशों के साथ गठबंधन करते हुए करेगा। इन सबका खासकर चीन के मामले में अमेरिकी नीति पर क्या असर होगा, एशिया में सबसे ज्यादा दिलचस्पी यही देखने पर है।

जो बाइडन ने नीतियां तय करने के लिए अनुभवी लोगों की टीम बनाई है। इनमें कई एशिया विशेषज्ञ हैं। एशिया प्रशांत क्षेत्र के लिए बाइडन ने कुर्त कैंपबेल को अपना विशेष दूत नियुक्त किया है। इस नियुक्ति का जापान और आस्ट्रेलिया में खास स्वागत हुआ। ये दोनों देश अमेरिकी खेमे में रहे हैं और चीन के साथ उनकी तीखी होड़ है। कुर्त कैंपबेल ने पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा के दौर में पाइवोट ऑफ एशिया (एशिया की धुरी) नीति बनाने में अहम भूमिका निभाई थी। इस नीति का मकसद चीन का प्रभाव सीमित करना था। जब कैंपबेल की नियुक्ति का एलान हुआ, तो अमेरिकी विदेश नीति विशेषज्ञ माइकल ग्रीन ने इस ओर ध्यान खींचा कि ‘चीन की जोर-जबर्दस्ती’ के खिलाफ कैंपबेल की ओबामा प्रशासन में मुख्य भूमिका रही थी।

बाइडन ने एशिया-प्रशांत मामलों की निगरानी के लिए अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद में टॉप विशेषज्ञों की एक टीम नियुक्त करने का एलान किया है। कैंपबेल की जिम्मदारी इस टीम, और अमेरिकी विदेश और रक्षा मंत्रालयों के बीच समन्वय बनाते हुए प्रशांत और हिंद महासागर क्षेत्र में अमेरिकी हितों की रक्षा के लिए सटीक नीतियां बनाने की होगी। अमेरिकी नौसेना की प्रशांत कमान के पूर्व सलाहकार एरिक सेयर्स ने एक ट्विट में कहा है- ‘हम ये जोखिम नहीं उठा सकते कि रक्षा मंत्रालय अपनी चीन रणनीति पर अमल करे, जबकि विदेश, व्यापार और वित्त मंत्रालय बिल्कुल अलग उद्देश्यों के लिए काम करें। कुर्त कैंपबेल के सामने यह अत्यंत कठिन जिम्मेदारी है कि वे इन सबको उस बस में बैठाएं, जिसकी ड्राइविंग वे खुद करेंगे।’

अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के पूर्व उप सलाहकार एली रैटनर और ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूट के नीति विश्लेषक रुश दोषी को कैंपबेल का सलाहकार बनाया गया है। हाल में इन दोनों के साथ मिलकर कैंपबेल ने कई लेख लिखे, जिन्हें पर्यवेक्षकों ने चीन के मामलों में डेमोक्रेटिक पार्टी की विदेश नीति संबंधी प्रमुख दस्तावेज माना है। इन लेखों में चीन का प्रभाव नियंत्रित करने के उपायों पर चर्चा की गई है। अमेरिकी पत्रिका फॉरेन अफेयर्स में लिखे एक लेख में इन तीनों ने कहा- तत्कालीन राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन के मेलमिलाप के लिए उठाए शुरुआती कदमों की आधी सदी बीत जाने के बाद यह अधिक से अधिक साफ होता गया है कि अमेरिका ने चीन के उदय से भला होने की बात में जरूरत से ज्यादा यकीन कर लिया था।

हाल के एक लेख में इन तीनों ने कहा कि चीन की बढ़ती आर्थिक शक्ति से (एशिया-प्रशांत) क्षेत्र का नाजुक संतुलन अस्थिर हो गया है और इससे चीन के क्षेत्रीय दुस्साहस को बढ़ावा मिला है। अगर चीन के व्यवहार को अनियंत्रित छोड़ दिया गया, तो इस इलाके की शांति खतरे में पड़ सकती है। जो बाइडन ने विदेश मंत्री के रूप में एंथनी ब्लिकेंन, रक्षा मंत्री के रूप में लॉयड ऑस्टिन और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के रूप में जेक सुलिवान को नियुक्त किया है। चीन के मामले में इन तीनों की राय भी कैंपबेल से मेल खाती है।

यह भी गौरतलब है कि कैंपबेल ने ट्रंप के कार्यकाल में चीन के प्रति उठाए गए कई सख्त कदमों का सार्वजनिक रूप से समर्थन किया था। लेकिन उन्होंने कहा है कि नए प्रशासन के तहत चीन के प्रति अमेरिकी कार्यनीति में भारी बदलाव होगा। उन्होंने ट्रंप प्रशासन की एकतरफा कार्रवाई की नीति की आलोचना की है और कहा है कि अब अमेरिका बहुपक्षीय सहयोग पर अधिक निर्भर करेगा। उन्होंने एशिया-प्रशांत क्षेत्र के साथ गंभीर वार्ता की राह पर चलने और चीन के साथ गैर-जरूरी टकराव टालने की बात भी कही है। कैंपबेल की राय है कि अमेरिका को चीन के साथ सुविचारित सहयोग के रास्ते पर चलना चाहिए।

सार

एशिया प्रशांत क्षेत्र के लिए बाइडन ने कुर्त कैंपबेल को अपना विशेष दूत नियुक्त किया है। इस नियुक्ति का जापान और आस्ट्रेलिया में खास स्वागत हुआ। ये दोनों देश अमेरिकी खेमे में रहे हैं और चीन के साथ उनकी तीखी होड़ है…

विस्तार

जो बाइडन के अमेरिका का राष्ट्रपति बन जाने के बाद एशिया-प्रशांत क्षेत्र में इस बात के कयास बढ़ गए हैं कि अब क्षेत्र में अमेरिकी नीतियों में क्या बदलाव आएगा। जो बाइडन ने चुनाव जीतने के बाद कहा था- अमेरिका इज बैक (यानी डोनाल्ड ट्रंप के चार साल के मनमौजी और अस्थिर नीतियों वाले कार्यकाल के बाद अब अमेरिका पुराने रूप में फिर से दुनिया के सामने होगा।) बाइडन की टीम ने आश्वासन दिया है कि अमेरिका दुनिया में फिर से नेतृत्वकारी भूमिका निभाएगा। ऐसा वह सहयोगी देशों के साथ गठबंधन करते हुए करेगा। इन सबका खासकर चीन के मामले में अमेरिकी नीति पर क्या असर होगा, एशिया में सबसे ज्यादा दिलचस्पी यही देखने पर है।

जो बाइडन ने नीतियां तय करने के लिए अनुभवी लोगों की टीम बनाई है। इनमें कई एशिया विशेषज्ञ हैं। एशिया प्रशांत क्षेत्र के लिए बाइडन ने कुर्त कैंपबेल को अपना विशेष दूत नियुक्त किया है। इस नियुक्ति का जापान और आस्ट्रेलिया में खास स्वागत हुआ। ये दोनों देश अमेरिकी खेमे में रहे हैं और चीन के साथ उनकी तीखी होड़ है। कुर्त कैंपबेल ने पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा के दौर में पाइवोट ऑफ एशिया (एशिया की धुरी) नीति बनाने में अहम भूमिका निभाई थी। इस नीति का मकसद चीन का प्रभाव सीमित करना था। जब कैंपबेल की नियुक्ति का एलान हुआ, तो अमेरिकी विदेश नीति विशेषज्ञ माइकल ग्रीन ने इस ओर ध्यान खींचा कि ‘चीन की जोर-जबर्दस्ती’ के खिलाफ कैंपबेल की ओबामा प्रशासन में मुख्य भूमिका रही थी।

बाइडन ने एशिया-प्रशांत मामलों की निगरानी के लिए अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद में टॉप विशेषज्ञों की एक टीम नियुक्त करने का एलान किया है। कैंपबेल की जिम्मदारी इस टीम, और अमेरिकी विदेश और रक्षा मंत्रालयों के बीच समन्वय बनाते हुए प्रशांत और हिंद महासागर क्षेत्र में अमेरिकी हितों की रक्षा के लिए सटीक नीतियां बनाने की होगी। अमेरिकी नौसेना की प्रशांत कमान के पूर्व सलाहकार एरिक सेयर्स ने एक ट्विट में कहा है- ‘हम ये जोखिम नहीं उठा सकते कि रक्षा मंत्रालय अपनी चीन रणनीति पर अमल करे, जबकि विदेश, व्यापार और वित्त मंत्रालय बिल्कुल अलग उद्देश्यों के लिए काम करें। कुर्त कैंपबेल के सामने यह अत्यंत कठिन जिम्मेदारी है कि वे इन सबको उस बस में बैठाएं, जिसकी ड्राइविंग वे खुद करेंगे।’

अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के पूर्व उप सलाहकार एली रैटनर और ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूट के नीति विश्लेषक रुश दोषी को कैंपबेल का सलाहकार बनाया गया है। हाल में इन दोनों के साथ मिलकर कैंपबेल ने कई लेख लिखे, जिन्हें पर्यवेक्षकों ने चीन के मामलों में डेमोक्रेटिक पार्टी की विदेश नीति संबंधी प्रमुख दस्तावेज माना है। इन लेखों में चीन का प्रभाव नियंत्रित करने के उपायों पर चर्चा की गई है। अमेरिकी पत्रिका फॉरेन अफेयर्स में लिखे एक लेख में इन तीनों ने कहा- तत्कालीन राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन के मेलमिलाप के लिए उठाए शुरुआती कदमों की आधी सदी बीत जाने के बाद यह अधिक से अधिक साफ होता गया है कि अमेरिका ने चीन के उदय से भला होने की बात में जरूरत से ज्यादा यकीन कर लिया था।

हाल के एक लेख में इन तीनों ने कहा कि चीन की बढ़ती आर्थिक शक्ति से (एशिया-प्रशांत) क्षेत्र का नाजुक संतुलन अस्थिर हो गया है और इससे चीन के क्षेत्रीय दुस्साहस को बढ़ावा मिला है। अगर चीन के व्यवहार को अनियंत्रित छोड़ दिया गया, तो इस इलाके की शांति खतरे में पड़ सकती है। जो बाइडन ने विदेश मंत्री के रूप में एंथनी ब्लिकेंन, रक्षा मंत्री के रूप में लॉयड ऑस्टिन और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के रूप में जेक सुलिवान को नियुक्त किया है। चीन के मामले में इन तीनों की राय भी कैंपबेल से मेल खाती है।

यह भी गौरतलब है कि कैंपबेल ने ट्रंप के कार्यकाल में चीन के प्रति उठाए गए कई सख्त कदमों का सार्वजनिक रूप से समर्थन किया था। लेकिन उन्होंने कहा है कि नए प्रशासन के तहत चीन के प्रति अमेरिकी कार्यनीति में भारी बदलाव होगा। उन्होंने ट्रंप प्रशासन की एकतरफा कार्रवाई की नीति की आलोचना की है और कहा है कि अब अमेरिका बहुपक्षीय सहयोग पर अधिक निर्भर करेगा। उन्होंने एशिया-प्रशांत क्षेत्र के साथ गंभीर वार्ता की राह पर चलने और चीन के साथ गैर-जरूरी टकराव टालने की बात भी कही है। कैंपबेल की राय है कि अमेरिका को चीन के साथ सुविचारित सहयोग के रास्ते पर चलना चाहिए।

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