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फेल हुई केंद्र सरकार की रणनीति, सुप्रीम कोर्ट जाने और मध्यस्थता से किसानों का इनकार

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जैसी आशंका पहले ही जाहिर की जा रही थी, किसानों और केंद्र सरकार के बीच आठवें दौर की बातचीत भी बेनतीजा रही। बेहद गरम माहौल में हुई बातचीत में केंद्र सरकार ने तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने से साफ इनकार कर दिया तो किसानों ने भी कानूनों की वापसी के अलावा किसी अन्य विकल्प पर विचार करने से मना कर दिया। केंद्र ने रणनीति अपनाई कि किसान सुप्रीम कोर्ट की बात मानने के लिए तैयार हो जाएं जिससे एक रास्ता निकाला जा सके, लेकिन किसान नेता इसके लिए भी तैयार नहीं हुए। उन्होंने कहा कि कानून वापसी ही एकमात्र रास्ता है। 

किसानों ने कहा कि वे इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में वादी नहीं बनना चाहते और इस मामले का हल केंद्र को ही निकालना पड़ेगा। अब दोनों पक्षों में 15 जनवरी को नौवें दौर की बातचीत होगी। इसके पूर्व सभी किसान संगठन 11 जनवरी को सिंधु बॉर्डर पर बैठक कर आगे की रणनीति तय करेंगे। इसी दिन सुप्रीम कोर्ट में भी इस मामले पर सुनवाई होनी है। केंद्र सरकार चाहती है कि किसान सुप्रीम कोर्ट की बात मानने के लिए तैयार हो जाएं। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट से आने वाला निर्णय और उसके बाद उसी शाम को होने वाली किसानों की बैठक बेहद महत्त्वपूर्ण मानी जा रही है।

किसान नेता प्रतिभा शिंदे ने कहा कि केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट की आड़ लेकर कृषि कानूनों को सही ठहराकर अपनी बात मनवाना चाहती है, लेकिन किसान इसके लिए तैयार नहीं हैं। किसानों को यह आशंका है कि केंद्र सरकार कानूनी दलीलों के सहारे अपनी बात को सही साबित कर सकती है। अगर ऐसा होता है तो इससे किसानों की नकारात्मक छवि बनेगी कि किसान नेता सुप्रीम कोर्ट की बात को भी स्वीकार नहीं करना चाहते।

दरअसल, किसान नेता कहते रहे हैं कि केंद्र सरकार को कृषि मुद्दों पर कानून बनाने का अधिकार नहीं है क्योंकि इस पर कानून बनाने का अधिकार संविधान में राज्यों को दिया गया है। लेकिन केंद्र सरकार इस बात को यह कहकर सही ठहराती रही है कि उसने कृषि विषयों पर नहीं, बल्कि उपज के व्यापार और विपणन पर कानून बनाया है जो उसके अधिकार क्षेत्र में आता है। अगर सुप्रीम कोर्ट में इस मामले पर सुनवाई होती है तो तकनीकी कारणों से यह बात केंद्र के पक्ष में जाएगी।

किसान नेता हन्नन मौला ने कहा कि वे अब यह तय नहीं करना चाहते कि ये कानून बनाना केंद्र के अधिकार क्षेत्र में है या नहीं, बल्कि वे इन कानूनों को किसानों के लिए हितकारी नहीं मानते और इसीलिए इनको वापस लेने की अपील कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि कोई कानून किसी के लिए हितकारी है या नहीं, इसका निर्णय उस कानून से प्रभावित होने वाला वर्ग ही कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट इसका निर्णय नहीं कर सकता। वह केवल कानूनों की वैधता की तकनीकी सुनवाई कर सकता है।

बाबा लखावाल सिंह पर कोई गतिरोध नहीं
आठवें दौर की बैठक से पूर्व केंद्र सरकार ने नानकसर गुरुद्वारे के प्रमुख बाबा लखावाल के जरिए गतिरोध दूर करने की भी कोशिश की थी। गुरुवार को बाबा लखावाल सिंह और कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर से बातचीत हुई और गतिरोध का हल निकालने की कोशिश हुई। लेकिन बातचीत शुरू होने से पूर्व ही किसानों ने यह साफ कर दिया कि उन्हें इस मामले पर किसी अन्य पक्ष की बातचीत स्वीकार नहीं होगी। आंदोलन और कृषि कानूनों के बारे में कोई फैसला केवल वही लोग करेंगे।

किसान नेता रविंदर सिंह चीमा ने कहा कि बाबा लखावाल सिंह एक धार्मिक नेता हैं और वे भी किसानों की परेशानी से अवगत हैं। वे भी चाहते हैं कि इस मामले का जल्द कोई समाधान निकले। उनकी केंद्र सरकार के साथ हुई बातचीत इसी दिशा में की गई एक कोशिश थी। लेकिन पंजाब की 450 जत्थेबंदियां इसके लिए सकारात्मक रुख नहीं रखतीं। यही कारण है कि संभवतः अब बाबा लखावाल सिंह भी इस मामले में दखलंदाजी नहीं करेंगे।

अगली वार्ता में केवल सात लोग आएं
किसान नेता गुरुनाम सिंह चढ़ूनी ने कहा कि सरकार ने यह कहा है कि अगले दौर की बातचीत के लिए केवल सात लोग ही आएं तो ज्यादा अच्छा रहेगा। किसान नेता ने कहा कि अब अगली बैठक कर उनके नेता यह निर्णय करेंगे कि उन्हें बातचीत के लिए आगे आना है या नहीं, क्योंकि सरकार केवल नई तारीख देकर वापस भेजने के लिए वार्ता कर रही है। उन्होंने कहा कि वे पूरी ताकत के साथ 26 जनवरी की किसान परेड सफल बनाने के लिए तैयारी कर रहे हैं।

सार

बेहद गरम माहौल में हुई किसानों-केंद्र सरकार के बीच बातचीत, केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट के पाले में गेंंद डालने की कोशिश की, किसानों ने सुप्रीम कोर्ट में पक्षकार बनने से किया इनकार, बाबा लखावाल सिंह की मध्यस्थता की बात भी नहीं बनी

विस्तार

जैसी आशंका पहले ही जाहिर की जा रही थी, किसानों और केंद्र सरकार के बीच आठवें दौर की बातचीत भी बेनतीजा रही। बेहद गरम माहौल में हुई बातचीत में केंद्र सरकार ने तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने से साफ इनकार कर दिया तो किसानों ने भी कानूनों की वापसी के अलावा किसी अन्य विकल्प पर विचार करने से मना कर दिया। केंद्र ने रणनीति अपनाई कि किसान सुप्रीम कोर्ट की बात मानने के लिए तैयार हो जाएं जिससे एक रास्ता निकाला जा सके, लेकिन किसान नेता इसके लिए भी तैयार नहीं हुए। उन्होंने कहा कि कानून वापसी ही एकमात्र रास्ता है। 

किसानों ने कहा कि वे इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में वादी नहीं बनना चाहते और इस मामले का हल केंद्र को ही निकालना पड़ेगा। अब दोनों पक्षों में 15 जनवरी को नौवें दौर की बातचीत होगी। इसके पूर्व सभी किसान संगठन 11 जनवरी को सिंधु बॉर्डर पर बैठक कर आगे की रणनीति तय करेंगे। इसी दिन सुप्रीम कोर्ट में भी इस मामले पर सुनवाई होनी है। केंद्र सरकार चाहती है कि किसान सुप्रीम कोर्ट की बात मानने के लिए तैयार हो जाएं। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट से आने वाला निर्णय और उसके बाद उसी शाम को होने वाली किसानों की बैठक बेहद महत्त्वपूर्ण मानी जा रही है।

किसान नेता प्रतिभा शिंदे ने कहा कि केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट की आड़ लेकर कृषि कानूनों को सही ठहराकर अपनी बात मनवाना चाहती है, लेकिन किसान इसके लिए तैयार नहीं हैं। किसानों को यह आशंका है कि केंद्र सरकार कानूनी दलीलों के सहारे अपनी बात को सही साबित कर सकती है। अगर ऐसा होता है तो इससे किसानों की नकारात्मक छवि बनेगी कि किसान नेता सुप्रीम कोर्ट की बात को भी स्वीकार नहीं करना चाहते।

दरअसल, किसान नेता कहते रहे हैं कि केंद्र सरकार को कृषि मुद्दों पर कानून बनाने का अधिकार नहीं है क्योंकि इस पर कानून बनाने का अधिकार संविधान में राज्यों को दिया गया है। लेकिन केंद्र सरकार इस बात को यह कहकर सही ठहराती रही है कि उसने कृषि विषयों पर नहीं, बल्कि उपज के व्यापार और विपणन पर कानून बनाया है जो उसके अधिकार क्षेत्र में आता है। अगर सुप्रीम कोर्ट में इस मामले पर सुनवाई होती है तो तकनीकी कारणों से यह बात केंद्र के पक्ष में जाएगी।

किसान नेता हन्नन मौला ने कहा कि वे अब यह तय नहीं करना चाहते कि ये कानून बनाना केंद्र के अधिकार क्षेत्र में है या नहीं, बल्कि वे इन कानूनों को किसानों के लिए हितकारी नहीं मानते और इसीलिए इनको वापस लेने की अपील कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि कोई कानून किसी के लिए हितकारी है या नहीं, इसका निर्णय उस कानून से प्रभावित होने वाला वर्ग ही कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट इसका निर्णय नहीं कर सकता। वह केवल कानूनों की वैधता की तकनीकी सुनवाई कर सकता है।

बाबा लखावाल सिंह पर कोई गतिरोध नहीं

आठवें दौर की बैठक से पूर्व केंद्र सरकार ने नानकसर गुरुद्वारे के प्रमुख बाबा लखावाल के जरिए गतिरोध दूर करने की भी कोशिश की थी। गुरुवार को बाबा लखावाल सिंह और कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर से बातचीत हुई और गतिरोध का हल निकालने की कोशिश हुई। लेकिन बातचीत शुरू होने से पूर्व ही किसानों ने यह साफ कर दिया कि उन्हें इस मामले पर किसी अन्य पक्ष की बातचीत स्वीकार नहीं होगी। आंदोलन और कृषि कानूनों के बारे में कोई फैसला केवल वही लोग करेंगे।

किसान नेता रविंदर सिंह चीमा ने कहा कि बाबा लखावाल सिंह एक धार्मिक नेता हैं और वे भी किसानों की परेशानी से अवगत हैं। वे भी चाहते हैं कि इस मामले का जल्द कोई समाधान निकले। उनकी केंद्र सरकार के साथ हुई बातचीत इसी दिशा में की गई एक कोशिश थी। लेकिन पंजाब की 450 जत्थेबंदियां इसके लिए सकारात्मक रुख नहीं रखतीं। यही कारण है कि संभवतः अब बाबा लखावाल सिंह भी इस मामले में दखलंदाजी नहीं करेंगे।

अगली वार्ता में केवल सात लोग आएं

किसान नेता गुरुनाम सिंह चढ़ूनी ने कहा कि सरकार ने यह कहा है कि अगले दौर की बातचीत के लिए केवल सात लोग ही आएं तो ज्यादा अच्छा रहेगा। किसान नेता ने कहा कि अब अगली बैठक कर उनके नेता यह निर्णय करेंगे कि उन्हें बातचीत के लिए आगे आना है या नहीं, क्योंकि सरकार केवल नई तारीख देकर वापस भेजने के लिए वार्ता कर रही है। उन्होंने कहा कि वे पूरी ताकत के साथ 26 जनवरी की किसान परेड सफल बनाने के लिए तैयारी कर रहे हैं।


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