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नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी का असली गुट कौन है, चुनाव आयोग के लिए यह तय करना हुआ मुश्किल

केपी शर्मा ओली और माधव कुमार नेपाल
– फोटो : सोशल मीडिया

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समाचार माध्यमों में ये खबर प्रमुखता से प्रचारित हुई कि नेपाल में कम्युनिस्ट पार्टी के पुष्प कमल दहल, माधव नेपाल गुट ने प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी से निकाल दिया है। लेकिन इस पार्टी का असली गुट और अध्यक्ष कौन है, इस बारे में कानूनी तौर पर अभी कोई फैसला नहीं हुआ है। इसलिए ये खबर विवादास्पद है। रविवार को नेपाल के निर्वाचन आयोग ने साफ कर दिया कि उसने किसी भी गुट को मान्यता नहीं दी है। आयोग ने कहा कि दोनों गुट राजनीतिक दल अधिनियम- 2007 का पालन करने में नाकाम रहे हैं।

पिछले 22 दिसंबर को ओली ने जब संसद के निचले सदन को भंग कराने का फैसला किया था, उसके बाद 2018 में बनी नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी में विभाजन हो गया था। तब से दोनों गुट खुद के असली होने का दावा कर रहे हैं। दोनों गुटों ने निर्वाचन आयोग से पार्टी के चुनाव निशान की मांग की हुई है। लेकिन रविवार को निर्वाचन आयोग के प्रवक्ता ने यहां के अखबार काठमांडू पोस्ट से कहा- इस बारे में फैसला नहीं लिया जा सका है, क्योंकि दोनों गुटों ने पार्टी संविधान का पालन नहीं किया है। इसलिए केपी शर्मा ओली और पुष्प कमल दहल को आयोग ने सूचित कर दिया है कि पार्टी के बारे में आयोग यथास्थिति बनाए रखेगा।

मई 2018 में पार्टी के गठन के बाद ओली और दहल दोनों को पार्टी का सह-अध्यक्ष बनाया गया था। आयोग के ताजा बयान से संकेत मिला है कि आयोग ने दोनों की इस हैसियत को कायम रखा है। इसका मतलब है कि आयोग ने तकनीकी और कानूनी रूप से पार्टी के विभाजन को स्वीकार नहीं किया है। आयोग कहना है कि पार्टी ने अपना जो संविधान आयोग को सौंपा था, दोनों गुट उसके मुताबिक आचरण करने में विफल रहे हैं।

सदन भंग कराने के बाद प्रधानमंत्री ओली ने 30 अप्रैल और 10 मई को नया चुनाव कराने का एलान किया था। इसके मद्देनजर आयोग के ताजा फैसले को बेहद अहम माना जा रहा है। विश्लेषकों का कहना है कि आयोग के इसी फैसले के बाद दहल-नेपाल गुट ने ओली की पार्टी की सदस्यता खत्म करने का फैसला किया। लेकिन ये फैसला कानूनी रूप से मान्य होगा, इसको लेकर अभी संदेह है।

कानून के जानकारों के मुताबिक राजनीतिक दल अधिनियम-2007 की धारा 51 के तहत ये प्रावधान है कि अगर पार्टी के नाम, विधान, विनियम, निशान, झंडे और पदाधिकारियों में कोई बदलाव होता है, तो इस बारे में निर्वाचन आयोग को औपचारिक रूप से सूचित करना जरूरी है। अगर सौंपे गए ब्योरे से आयोग संतुष्ट होगा, तभी वह बदलावों को मान्यता देगा। अगर वह संतुष्ट ना हुआ तो वह पुराने ब्योरे को ही मान्यता देता रहेगा। आयोग को ऐसा करने का अधिकार इसी कानून की धारा 25 (6) के तहत मिला हुआ है।

आयोग के अधिकारी ने स्थानीय मीडिया से कहा है कि ओली को पार्टी अध्यक्ष से हटाकर नया अध्यक्ष नियुक्त करने का फैसला करते वक्त दहल-नेपाल खेमे ने पार्टी संविधान का पालन नहीं किया। 22 दिसंबर को इस खेमे ने ओली को हटा कर दहल और माधव नेपाल को नया सह-अध्यक्ष नियुक्त किया था। आयोग के अधिकारी ने कहा कि ओली गुट ने भी दहल को सह-अध्यक्ष पद से हटाने और केंद्रीय समिति के विस्तार का कदम पार्टी संविधान के खिलाफ जाकर उठाया।

राजनीतिक दल अधिनियम के मुताबिक कोई गुट अगर मूल पार्टी पर दावा करना चाहता हो या खुद को नए दल के रूप में रजिस्टर्ड कराना चाहता हो, तो उसे सेंट्रल कमेटी के 40 फीसदी सदस्यों के दस्तखत पेश करने होंगे। पार्टी के खाली पद पर नियुक्ति के लिए सेंट्रल कमेटी के दो तिहाई सदस्यों का समर्थन जरूरी है। ये शर्तें किसी गुट ने पूरी नहीं की हैं। इसी तरह सेंट्रल कमेटी सिर्फ दस फीसदी नए सदस्य मनोनीत कर सकती है। ओली गुट ने इस शर्त का उल्लंघन किया। तो कुल मिलाकर मामला उलझा हुआ है। इससे नेपाल में राजनीतिक अस्थिरता का दौर लंबा खिंचने का अंदेशा है।

सार

मई 2018 में पार्टी के गठन के बाद ओली और दहल दोनों को पार्टी का सह-अध्यक्ष बनाया गया था। आयोग के ताजा बयान से संकेत मिला है कि आयोग ने दोनों की इस हैसियत को कायम रखा है…

विस्तार

समाचार माध्यमों में ये खबर प्रमुखता से प्रचारित हुई कि नेपाल में कम्युनिस्ट पार्टी के पुष्प कमल दहल, माधव नेपाल गुट ने प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी से निकाल दिया है। लेकिन इस पार्टी का असली गुट और अध्यक्ष कौन है, इस बारे में कानूनी तौर पर अभी कोई फैसला नहीं हुआ है। इसलिए ये खबर विवादास्पद है। रविवार को नेपाल के निर्वाचन आयोग ने साफ कर दिया कि उसने किसी भी गुट को मान्यता नहीं दी है। आयोग ने कहा कि दोनों गुट राजनीतिक दल अधिनियम- 2007 का पालन करने में नाकाम रहे हैं।

पिछले 22 दिसंबर को ओली ने जब संसद के निचले सदन को भंग कराने का फैसला किया था, उसके बाद 2018 में बनी नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी में विभाजन हो गया था। तब से दोनों गुट खुद के असली होने का दावा कर रहे हैं। दोनों गुटों ने निर्वाचन आयोग से पार्टी के चुनाव निशान की मांग की हुई है। लेकिन रविवार को निर्वाचन आयोग के प्रवक्ता ने यहां के अखबार काठमांडू पोस्ट से कहा- इस बारे में फैसला नहीं लिया जा सका है, क्योंकि दोनों गुटों ने पार्टी संविधान का पालन नहीं किया है। इसलिए केपी शर्मा ओली और पुष्प कमल दहल को आयोग ने सूचित कर दिया है कि पार्टी के बारे में आयोग यथास्थिति बनाए रखेगा।

मई 2018 में पार्टी के गठन के बाद ओली और दहल दोनों को पार्टी का सह-अध्यक्ष बनाया गया था। आयोग के ताजा बयान से संकेत मिला है कि आयोग ने दोनों की इस हैसियत को कायम रखा है। इसका मतलब है कि आयोग ने तकनीकी और कानूनी रूप से पार्टी के विभाजन को स्वीकार नहीं किया है। आयोग कहना है कि पार्टी ने अपना जो संविधान आयोग को सौंपा था, दोनों गुट उसके मुताबिक आचरण करने में विफल रहे हैं।

सदन भंग कराने के बाद प्रधानमंत्री ओली ने 30 अप्रैल और 10 मई को नया चुनाव कराने का एलान किया था। इसके मद्देनजर आयोग के ताजा फैसले को बेहद अहम माना जा रहा है। विश्लेषकों का कहना है कि आयोग के इसी फैसले के बाद दहल-नेपाल गुट ने ओली की पार्टी की सदस्यता खत्म करने का फैसला किया। लेकिन ये फैसला कानूनी रूप से मान्य होगा, इसको लेकर अभी संदेह है।

कानून के जानकारों के मुताबिक राजनीतिक दल अधिनियम-2007 की धारा 51 के तहत ये प्रावधान है कि अगर पार्टी के नाम, विधान, विनियम, निशान, झंडे और पदाधिकारियों में कोई बदलाव होता है, तो इस बारे में निर्वाचन आयोग को औपचारिक रूप से सूचित करना जरूरी है। अगर सौंपे गए ब्योरे से आयोग संतुष्ट होगा, तभी वह बदलावों को मान्यता देगा। अगर वह संतुष्ट ना हुआ तो वह पुराने ब्योरे को ही मान्यता देता रहेगा। आयोग को ऐसा करने का अधिकार इसी कानून की धारा 25 (6) के तहत मिला हुआ है।

आयोग के अधिकारी ने स्थानीय मीडिया से कहा है कि ओली को पार्टी अध्यक्ष से हटाकर नया अध्यक्ष नियुक्त करने का फैसला करते वक्त दहल-नेपाल खेमे ने पार्टी संविधान का पालन नहीं किया। 22 दिसंबर को इस खेमे ने ओली को हटा कर दहल और माधव नेपाल को नया सह-अध्यक्ष नियुक्त किया था। आयोग के अधिकारी ने कहा कि ओली गुट ने भी दहल को सह-अध्यक्ष पद से हटाने और केंद्रीय समिति के विस्तार का कदम पार्टी संविधान के खिलाफ जाकर उठाया।

राजनीतिक दल अधिनियम के मुताबिक कोई गुट अगर मूल पार्टी पर दावा करना चाहता हो या खुद को नए दल के रूप में रजिस्टर्ड कराना चाहता हो, तो उसे सेंट्रल कमेटी के 40 फीसदी सदस्यों के दस्तखत पेश करने होंगे। पार्टी के खाली पद पर नियुक्ति के लिए सेंट्रल कमेटी के दो तिहाई सदस्यों का समर्थन जरूरी है। ये शर्तें किसी गुट ने पूरी नहीं की हैं। इसी तरह सेंट्रल कमेटी सिर्फ दस फीसदी नए सदस्य मनोनीत कर सकती है। ओली गुट ने इस शर्त का उल्लंघन किया। तो कुल मिलाकर मामला उलझा हुआ है। इससे नेपाल में राजनीतिक अस्थिरता का दौर लंबा खिंचने का अंदेशा है।

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