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दिल्ली हिंसा से पंजाब शर्मसार : किसानों का दर्द-हिंसा से आंदोलन पर पड़ेगा विपरीत असर

सुरिंदर पाल, अमर उजाला, जालंधर (पंजाब)
Updated Wed, 27 Jan 2021 02:21 PM IST

लाल किले पर प्रदर्शन करते किसान
– फोटो : पीटीआई

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दिल्ली में 26 जनवरी को ट्रैक्टर परेड के दौरान जो हिंसा हुई, उससे पंजाब शर्मसार हो गया है। दिल्ली में जो बवाल हुआ, उसके लिए किसानों को माफी तक मांगनी पड़ी। वहीं इसके बाद अब किसान आंदोलन युवाओं और बुजुर्गों में बंट गया है। 

26 जनवरी को दिल्ली गई ट्रैक्टर परेड में युवाओं का नेतृत्व पंजाब के लक्खा सिधाना और दीप सिद्धू कर रहे थे। दूसरी तरफ किसान यूनियन को भारतीय किसान यूनियन के बलबीर सिंह राजेवाल और डॉ. दर्शनपाल लीड कर रहे थे। आंदोलन के दौरान दोनों में आपसी तालमेल इस कदर गड़बड़ा गया कि युवाओं ने लाल किले पर जाकर न केवल खालसा व किसान ध्वज फहरा दिया वहीं पुलिस पर हमला और तोड़फोड़ की। इसका जिम्मेदार दीप सिद्धू को ठहराया जा रहा है। वहीं किसान संयुक्त मोर्चा ने इस पूरे प्रकरण से पल्ला झाड़ लिया। 

यह भी पढ़ें – Farmer Protest Today: कौन है लक्खा सिधाना जिसका दिल्ली हिंसा में आया नाम, जानिए पंजाब के बड़े राजनेता से क्या है नाता

मंगलवार को लाल किले पर खालसा ध्वज फहराने के बाद दीप सिद्धू बुधवार को अपने ट्रैक्टर पर तिरंगा लगाकर सिंघु बार्डर किसानों के बीच पहुंचे जहां किसानों ने उन्हें घेर लिया और कहा कि ट्रैक्टर परेड छोड़कर लाल किला क्या करने गए थे। सूत्रों के अनुसार, किसानों ने दीप सिद्धू को पीटने की कोशिश की तो वह अकेला ही दौड़ गया। किसान दूर तक उसको दौड़ाकर आए।

भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय नेता जगजीत सिंह डल्लेवाल ने कहा कि लाल किले की घटना से किसानों को गहरी चोट लगी है। किसान परेड तो तिरंगे के साथ निकली थी और उसका रूट तय था लेकिन लाल किले पर जो लोग पहुंचे वह एक साजिश थी। किसानों से उनका कोई लेना-देना नहीं था। बीच में ऐसे लोग थे जो माहौल को खराब करने की साजिश रच रहे थे। हमें काफी लंबे समय से खालिस्तानी साबित करने की कोशिश की जा रही थी और एजेंसियां उसमें कामयाब हुई हैं। हमारा आंदोलन निश्चित रूप से पिछड़ा है।

युवाओं पर कंट्रोल करना जरूरी

खालसा एड के रवि सिंह ने एक वीडियो जारी कर कहा है कि युवाओं और बुजुर्गों में तालमेल की कमी हो गई है। युवाओं को साथ लेकर चलना होगा और उन पर कंट्रोल भी जरूरी है। यह भी सोचने की जरूरत है कि लाल किले तक युवा कैसे पहुंचे। गणतंत्र दिवस पर जहां परिंदा पर नहीं मार सकता, वहां तक युवा पहुंचने में सफल हो गए।  

किरती किसान यूनियन के उपाध्यक्ष राजिंदर सिंह का कहना है कि हमारा मुद्दा खेती कानून रद्द करवाने का है। इस हिंसा के बाद हमारा खेती कानूनों का मुद्दा जमीन पर रह गया और बाकी मुद्दे उछाल दिए गए। हमारे साथी निराश हैं। किसान जत्थेबंदियों ने ट्रैक्टर परेड निकलानी थी, उसको सफलतापूर्वक निकाला। एक फरवरी को संसद तक पैदल मार्च निकालना है। इंटरनेट बंद कर हमारे अधिकारों को खत्म किया गया है। ट्रैक्टर परेड आखिरी पड़ाव नहीं है। किसान जत्थेबंदियों के फैसले को मानना चाहिए। हमें अंदर में ऐसे लोगों की पहचान करनी होगी। युवाओं को भड़काया जा रहा है, उनको स्टेज पर कब्जा करने के लिए उकसाया जाता रहा है। यह लोग जत्थेबंदियां नहीं एक गिरोह है। 

दिल्ली में 26 जनवरी को ट्रैक्टर परेड के दौरान जो हिंसा हुई, उससे पंजाब शर्मसार हो गया है। दिल्ली में जो बवाल हुआ, उसके लिए किसानों को माफी तक मांगनी पड़ी। वहीं इसके बाद अब किसान आंदोलन युवाओं और बुजुर्गों में बंट गया है। 

26 जनवरी को दिल्ली गई ट्रैक्टर परेड में युवाओं का नेतृत्व पंजाब के लक्खा सिधाना और दीप सिद्धू कर रहे थे। दूसरी तरफ किसान यूनियन को भारतीय किसान यूनियन के बलबीर सिंह राजेवाल और डॉ. दर्शनपाल लीड कर रहे थे। आंदोलन के दौरान दोनों में आपसी तालमेल इस कदर गड़बड़ा गया कि युवाओं ने लाल किले पर जाकर न केवल खालसा व किसान ध्वज फहरा दिया वहीं पुलिस पर हमला और तोड़फोड़ की। इसका जिम्मेदार दीप सिद्धू को ठहराया जा रहा है। वहीं किसान संयुक्त मोर्चा ने इस पूरे प्रकरण से पल्ला झाड़ लिया। 

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मंगलवार को लाल किले पर खालसा ध्वज फहराने के बाद दीप सिद्धू बुधवार को अपने ट्रैक्टर पर तिरंगा लगाकर सिंघु बार्डर किसानों के बीच पहुंचे जहां किसानों ने उन्हें घेर लिया और कहा कि ट्रैक्टर परेड छोड़कर लाल किला क्या करने गए थे। सूत्रों के अनुसार, किसानों ने दीप सिद्धू को पीटने की कोशिश की तो वह अकेला ही दौड़ गया। किसान दूर तक उसको दौड़ाकर आए।

भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय नेता जगजीत सिंह डल्लेवाल ने कहा कि लाल किले की घटना से किसानों को गहरी चोट लगी है। किसान परेड तो तिरंगे के साथ निकली थी और उसका रूट तय था लेकिन लाल किले पर जो लोग पहुंचे वह एक साजिश थी। किसानों से उनका कोई लेना-देना नहीं था। बीच में ऐसे लोग थे जो माहौल को खराब करने की साजिश रच रहे थे। हमें काफी लंबे समय से खालिस्तानी साबित करने की कोशिश की जा रही थी और एजेंसियां उसमें कामयाब हुई हैं। हमारा आंदोलन निश्चित रूप से पिछड़ा है।

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