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तालिबान कर रहा है अफगानिस्तान में बुद्धिजीवियों की हत्या, अमेरिकी सैनिकों की वापसी का उठा रहा है फायदा!

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अमेरिका में हुए इस एलान से अफगानिस्तान में चिंता बढ़ गई है कि जो बाइडन प्रशासन भी अफगानिस्तान से सेना वापसी के मामले में पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन की नीति पर चलेगा। ये एलान उस समय हुआ है, जब अफगानिस्तान में हत्याओं की झड़ी लगी हुई है। इस दौर में आतंकवादियों ने खासकर बुद्धिजीवियों को निशाना बनाया है। गैर-सरकारी संस्था अफगान पीस वॉच के मुताबिक इस साल एक से 20 जनवरी तक 40 लोगों की हत्या की गई। जबकि 2020 के आखिरी तीन महीनों में 130 से अधिक लोगों की हत्या हुई थी।

ये हिंसा उस समय जारी है, जब कतर की राजधानी दोहा में तालिबान और अफगान सरकार के बीच बातचीत चल रही है। ये बातचीत पूर्व ट्रंप प्रशासन की पहल पर शुरू हुई थी। अफगान सरकार ने वार्ता के दौरान युद्धविराम पर पर जोर दिया है, लेकिन आतंकवादियों ने असल में इस दौर में हिंसा तेज कर दी है।

पूर्व ट्रंप प्रशासन ने इस साल मई तक अफगानिस्तान से सभी अमेरिकी सैनिकों को वापस बुलाने का एलान किया था। अमेरिका के नए विदेश मंत्री एंथनी ब्लिंकेन ने पिछले हफ्ते कहा कि नया अमेरिकी प्रशासन भी अमेरिकी सैनिकों को अफगानिस्तान से वापस लाना चाहता है। हालांकि उन्होंने कहा कि अफगानिस्तान में फिर से आतंकवाद सिर ना उठाए, इसके लिए जरूरी क्षमता वहां बरकरार रखी जाएगी।

इस बीच हाल में हुई हत्याओं के कारण यहां भय का माहौल है। अफगानिस्तान की दो महिला जजों की इस महीने यहां गोली मार कर हत्या कर दी गई। उनमें से एक के भाई हाजी मुस्तफा ने कहा है कि ये हत्या तालिबान ने की। उन्होंने एक टीवी चैनल से कहा- मेरी बहन पढ़ी-लिखी और उदार सोच की महिला थी। वह देश के लिए कुछ करना चाहती थी। लेकिन वे (तालिबान) पढ़े-लिखे और उदार सोच के व्यक्तियों का सफाया करना और देश को फिर से अंधकार युग में वापस ले जाना चाहते हैं।

लेकिन तालिबान नेताओं ने इस बात का खंडन किया है कि वे असैनिक लोगों की हत्या करते हैं। उन्होंने कहा है कि महिला जजों की हत्या में तालिबान का हाथ नहीं है। इस बीच इस महीने जिन लोगों की हत्या की गई, उनमें काबुल के डिप्टी गवर्नर, घौर प्रांत में एक रेडियो स्टेशन के प्रमुख और कपिसा प्रांत में एक महिला अधिकार कार्यकर्ता शामिल हैं। गैर सरकारी संस्था अफगान पीस वॉच के संस्थापक हबीब खान ने एक अमेरिकी टीवी चैनल से कहा- इस तरह की हत्याओं का मकसद अफगानिस्तान के दिमाग को मार डालना है। इससे ऐसा खालीपन पैदा होता है, जिसे भरने में दशकों लगेंगे।

अफगान गृह मंत्रालय ने कहा है कि उसके पास इस महीने हुई हत्याओं की कोई सूची नहीं है। ना ही उसे इसकी जानकारी है कि इन हत्याओं के पीछे किसका हाथ है। लेकिन आम धारणा यही है कि ज्यादातर हत्याओं के पीछे तालिबान का हाथ है। अमेरिकी मानव अधिकार संस्था ह्यूमन राइट्स वॉच के एशिया डिवीजन की निदेशक पैर्टिसिया गॉसमैन ने अमेरिकी टीवी चैनल एनबीसी से कहा कि अगर सभी नहीं, तो निश्चित रूप से ज्यादातर हत्याएं तालिबान ने की हैं। उन्होंने कहा कि हत्याओं की संख्या में इजाफा तालिबान के मन में आए इस भाव के साथ हुआ है कि जीत अब उसके काफी करीब है।

तालिबान के इस दावे के बारे में कि वह नागरिकों की हत्या नहीं करता, गॉसमैन ने कहा कि दरअसल, तालिबान अपने ढंग से खुद तय करता है कि असैन्य नागरिक कौन है। जिन लोगों की हत्याएं हुई हैं, तालिबान उन्हें सरकार से जुड़ा मानता है। अतीत में वह कह चुका है कि जो लोग सरकार के लिए काम करते हैं, वे असैन्य नागरिक नहीं हैं। दूसरे जानकारों के मुताबिक कई दूसरे उग्रवादी गुट भी अफगानिस्तान में सक्रिय हैं। वे भी लगातार हिंसक गतिविधियों में शामिल रहते हैं। राष्ट्रपति अशरफ ग़नी ने हाल में हुई हत्याओं की पूरी जांच का आदेश दिया है, लेकिन अफगानिस्तान में ऐसे आदेशों से लोगों में ज्यादा भरोसा नहीं बंधता।

फिलहाल, हकीकत यह है कि बुद्धिजीवियों की हत्याओं से अफगानिस्तान हिला हुआ है। अभी जब यह हाल है, तो अमेरिकी फौज की वापसी के बाद क्या होगा, यह भय यहां के लोगों में गहरे से बैठा हुआ है। ये आम समझ है कि अमेरिकी फौज की वापसी के बाद तालिबान किसी के काबू में नहीं रहेगा। अफगानिस्तान में एक बार फिर उसका राज कायम हो जाने की आशंका बेहद मजबूत है।

 

सार

गैर-सरकारी संस्था अफगान पीस वॉच के मुताबिक इस साल एक से 20 जनवरी तक 40 लोगों की हत्या की गई। जबकि 2020 के आखिरी तीन महीनों में 130 से अधिक लोगों की हत्या हुई थी…

विस्तार

अमेरिका में हुए इस एलान से अफगानिस्तान में चिंता बढ़ गई है कि जो बाइडन प्रशासन भी अफगानिस्तान से सेना वापसी के मामले में पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन की नीति पर चलेगा। ये एलान उस समय हुआ है, जब अफगानिस्तान में हत्याओं की झड़ी लगी हुई है। इस दौर में आतंकवादियों ने खासकर बुद्धिजीवियों को निशाना बनाया है। गैर-सरकारी संस्था अफगान पीस वॉच के मुताबिक इस साल एक से 20 जनवरी तक 40 लोगों की हत्या की गई। जबकि 2020 के आखिरी तीन महीनों में 130 से अधिक लोगों की हत्या हुई थी।

ये हिंसा उस समय जारी है, जब कतर की राजधानी दोहा में तालिबान और अफगान सरकार के बीच बातचीत चल रही है। ये बातचीत पूर्व ट्रंप प्रशासन की पहल पर शुरू हुई थी। अफगान सरकार ने वार्ता के दौरान युद्धविराम पर पर जोर दिया है, लेकिन आतंकवादियों ने असल में इस दौर में हिंसा तेज कर दी है।

पूर्व ट्रंप प्रशासन ने इस साल मई तक अफगानिस्तान से सभी अमेरिकी सैनिकों को वापस बुलाने का एलान किया था। अमेरिका के नए विदेश मंत्री एंथनी ब्लिंकेन ने पिछले हफ्ते कहा कि नया अमेरिकी प्रशासन भी अमेरिकी सैनिकों को अफगानिस्तान से वापस लाना चाहता है। हालांकि उन्होंने कहा कि अफगानिस्तान में फिर से आतंकवाद सिर ना उठाए, इसके लिए जरूरी क्षमता वहां बरकरार रखी जाएगी।

इस बीच हाल में हुई हत्याओं के कारण यहां भय का माहौल है। अफगानिस्तान की दो महिला जजों की इस महीने यहां गोली मार कर हत्या कर दी गई। उनमें से एक के भाई हाजी मुस्तफा ने कहा है कि ये हत्या तालिबान ने की। उन्होंने एक टीवी चैनल से कहा- मेरी बहन पढ़ी-लिखी और उदार सोच की महिला थी। वह देश के लिए कुछ करना चाहती थी। लेकिन वे (तालिबान) पढ़े-लिखे और उदार सोच के व्यक्तियों का सफाया करना और देश को फिर से अंधकार युग में वापस ले जाना चाहते हैं।

लेकिन तालिबान नेताओं ने इस बात का खंडन किया है कि वे असैनिक लोगों की हत्या करते हैं। उन्होंने कहा है कि महिला जजों की हत्या में तालिबान का हाथ नहीं है। इस बीच इस महीने जिन लोगों की हत्या की गई, उनमें काबुल के डिप्टी गवर्नर, घौर प्रांत में एक रेडियो स्टेशन के प्रमुख और कपिसा प्रांत में एक महिला अधिकार कार्यकर्ता शामिल हैं। गैर सरकारी संस्था अफगान पीस वॉच के संस्थापक हबीब खान ने एक अमेरिकी टीवी चैनल से कहा- इस तरह की हत्याओं का मकसद अफगानिस्तान के दिमाग को मार डालना है। इससे ऐसा खालीपन पैदा होता है, जिसे भरने में दशकों लगेंगे।

अफगान गृह मंत्रालय ने कहा है कि उसके पास इस महीने हुई हत्याओं की कोई सूची नहीं है। ना ही उसे इसकी जानकारी है कि इन हत्याओं के पीछे किसका हाथ है। लेकिन आम धारणा यही है कि ज्यादातर हत्याओं के पीछे तालिबान का हाथ है। अमेरिकी मानव अधिकार संस्था ह्यूमन राइट्स वॉच के एशिया डिवीजन की निदेशक पैर्टिसिया गॉसमैन ने अमेरिकी टीवी चैनल एनबीसी से कहा कि अगर सभी नहीं, तो निश्चित रूप से ज्यादातर हत्याएं तालिबान ने की हैं। उन्होंने कहा कि हत्याओं की संख्या में इजाफा तालिबान के मन में आए इस भाव के साथ हुआ है कि जीत अब उसके काफी करीब है।

तालिबान के इस दावे के बारे में कि वह नागरिकों की हत्या नहीं करता, गॉसमैन ने कहा कि दरअसल, तालिबान अपने ढंग से खुद तय करता है कि असैन्य नागरिक कौन है। जिन लोगों की हत्याएं हुई हैं, तालिबान उन्हें सरकार से जुड़ा मानता है। अतीत में वह कह चुका है कि जो लोग सरकार के लिए काम करते हैं, वे असैन्य नागरिक नहीं हैं। दूसरे जानकारों के मुताबिक कई दूसरे उग्रवादी गुट भी अफगानिस्तान में सक्रिय हैं। वे भी लगातार हिंसक गतिविधियों में शामिल रहते हैं। राष्ट्रपति अशरफ ग़नी ने हाल में हुई हत्याओं की पूरी जांच का आदेश दिया है, लेकिन अफगानिस्तान में ऐसे आदेशों से लोगों में ज्यादा भरोसा नहीं बंधता।

फिलहाल, हकीकत यह है कि बुद्धिजीवियों की हत्याओं से अफगानिस्तान हिला हुआ है। अभी जब यह हाल है, तो अमेरिकी फौज की वापसी के बाद क्या होगा, यह भय यहां के लोगों में गहरे से बैठा हुआ है। ये आम समझ है कि अमेरिकी फौज की वापसी के बाद तालिबान किसी के काबू में नहीं रहेगा। अफगानिस्तान में एक बार फिर उसका राज कायम हो जाने की आशंका बेहद मजबूत है।

 

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