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डॉक्टर के मौखिक आश्वासन के बाद ही वैक्सीन लगवाने को हुए तैयार, जानिए टीका लगवाते समय कैसी होती है वॉलियंटर की मनोस्थिति

एम्स में भारत बायोटेक की वैक्सीन लगवाते अफजल आलम
– फोटो : अमर उजाला

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दुनिया में कोरोना के अस्तित्व को एक साल हो चुका है लेकिन कुछ ही महीनों के भीतर वैज्ञानिकों ने इसकी वैक्सीन बनाने का दावा ठोक दिया था। हाल ही में कोरोना की दो वैक्सीन को आपातकाल में इस्तेमाल की मंजूरी मिली, जिसमें सीरम इंस्टीट्यूट की कोविशील्ड और भारत बायोटेक की कोवैक्सीन शामिल हैं। पिछले महीने एम्स, नई दिल्ली में कोवैक्सीन के तीसरे चरण के परीक्षण में कई लोगों को वॉलियंटर बनाया गया, जिन्होंने इस महामारी को हराने में अपना योगदान दिया। ऐसे ही एक शख्स से अमर उजाला ने बातचीत की और वैक्सीन लगवाने के उनके अनुभव को जाना। यहां पढ़िए कि अफजल आलम के लिए टीका लगवाना कैसे समाज के प्रति उनकी जिम्मेदारी को दर्शाता है…

1. कोवैक्सीन के ट्रायल में हिस्सा लेने के पीछे क्या कारण था?
कोरोना की वैक्सीन के लिए वैज्ञानिक महीनों से दिन-रात एक कर मेहनत कर रहे थे। जब मुझे सोशल मीडिया के जरिए इसकी जानकारी मिली कि एम्स दिल्ली में कोवैक्सीन का ट्रायल होना है तब मैंने इसमें हिस्सा लेने का फैसला कर लिया था।

मेरा मानना है कि अगर कोरोना को खत्म करने के लिए टीका बन जाता है तो इससे जिंदगी आसान हो जाएगी। गरीब-मजदूर आसानी से रोजी-रोटी की तलाश कर पाएंगे, जिनकी नौकरी चली गई है, शायद उन्हें वापस मिल जाए।

टीका लगवाने का फैसला लेने के बाद आपके मन में कैसे सवाल चल रहे थे?
टीका लगवाते समय मेरे मन में बहुत कुछ चल रहा था। मुझे सबसे ज्यादा इस बात का डर था कि अगर वैक्सीन के साइड इफेक्ट से मेरी जान चली जाती है या किसी तरह की अपंगता आती है तो क्या वैक्सीन कंपनी मेरे परिवार को वित्तीय सहायता मुहैया कराएगी। इस सवाल पर वहां मौजूद डॉक्टर ने मौखिक आश्वासन दिया कि आपकी उम्र और आय के आधार पर मदद की जाएगी। डॉक्टर की बात से संतुष्ट होने के बाद ही मैं टीका लगवाने की प्रक्रिया में शामिल हुआ। डॉक्टर ने बताया कि कोवैक्सीन की पहली डोज लेने के बाद आप छह महीनों तक परिवार नियोजन नहीं कर सकते हैं। वहीं अगले छह महीने तक रक्तदान नहीं कर सकते। 

वैक्सीन लगवाने से पहले मेरी लंबाई और वजन को मापा गया। इसके बाद जूनियर डॉक्टर ने ब्लड प्रेशर मापा। कुछ जरूरी सवाल भी किए गए। इसके बाद सीनियर डॉक्टरों की एक टीम ने हमारी कोरोना की जांच की और इसके बाद आखिर में वैक्सीन दी गई। इस पूरी प्रक्रिया में लगभग एक घंटे का समय लगा। वैक्सीन देने के बाद सभी लोगों को आधे घंटे तक निगरानी में रखा गया। 30 दिसंबर को दोपहर को करीब तीन बजे एम्स नई दिल्ली के वैक्सीनेशन सेंटर पर पहुंचा था।

नहीं, मैंने अपने परिवार वालों को इसके बारे में कोई जानकारी नहीं दी थी। हालांकि सोशल मीडिया के जरिए परिवार के कुछ सदस्यों तक यह बात जरूर पहुंच गई थी लेकिन मैंने उन्हें आश्वस्त कर दिया था कि इसका कोई साइड इफेक्ट नहीं है। हां, ट्रायल में हिस्सा लेने से पहले डर जरूर लगा था लेकिन रक्तदान के अनुभव से काफी मदद मिली थी। यह बात जरूर थी कि अगर मैं अपने घरवालों को इसके बारे में बताता तो वो कभी राजी नहीं होते।

हां, जरूर। मेरा मानना है कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। अगर आपको कभी समाज की सेवा करने का मौका मिल रहा है तो उसे गंवाना नहीं चाहिए। अगर मुझे भविष्य में ऐसे सामाजिक सरोकार वाले कार्यों में भाग लेने का मौका मिलेगा तो मैं जरूर भाग लूंगा।

दुनिया में कोरोना के अस्तित्व को एक साल हो चुका है लेकिन कुछ ही महीनों के भीतर वैज्ञानिकों ने इसकी वैक्सीन बनाने का दावा ठोक दिया था। हाल ही में कोरोना की दो वैक्सीन को आपातकाल में इस्तेमाल की मंजूरी मिली, जिसमें सीरम इंस्टीट्यूट की कोविशील्ड और भारत बायोटेक की कोवैक्सीन शामिल हैं। पिछले महीने एम्स, नई दिल्ली में कोवैक्सीन के तीसरे चरण के परीक्षण में कई लोगों को वॉलियंटर बनाया गया, जिन्होंने इस महामारी को हराने में अपना योगदान दिया। ऐसे ही एक शख्स से अमर उजाला ने बातचीत की और वैक्सीन लगवाने के उनके अनुभव को जाना। यहां पढ़िए कि अफजल आलम के लिए टीका लगवाना कैसे समाज के प्रति उनकी जिम्मेदारी को दर्शाता है…

1. कोवैक्सीन के ट्रायल में हिस्सा लेने के पीछे क्या कारण था?

कोरोना की वैक्सीन के लिए वैज्ञानिक महीनों से दिन-रात एक कर मेहनत कर रहे थे। जब मुझे सोशल मीडिया के जरिए इसकी जानकारी मिली कि एम्स दिल्ली में कोवैक्सीन का ट्रायल होना है तब मैंने इसमें हिस्सा लेने का फैसला कर लिया था।

मेरा मानना है कि अगर कोरोना को खत्म करने के लिए टीका बन जाता है तो इससे जिंदगी आसान हो जाएगी। गरीब-मजदूर आसानी से रोजी-रोटी की तलाश कर पाएंगे, जिनकी नौकरी चली गई है, शायद उन्हें वापस मिल जाए।


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2. क्या आपको डर लग रहा था?


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