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जोर जबरदस्ती से संसद में पारित कराए कानून सरकार को वापस लेने चाहिए: यशवंत सिन्हा

पूर्व केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा

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पूर्व केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा ने दिल्ली की सीमाओं पर करीब दो महीने से डटे किसानों की मांगों का समर्थन किया है और सरकार की जिद और किसान विरोधी रवैये की कड़ी निंदा की है। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार पहले बगैर किसी से विचार विमर्श किए तीनों अध्यादेश लेकर आई बाद में संसद से इसे जोर जबरदस्ती से पारित करवा लिया। इस सरकार ने लोकतंत्र और उसकी परंपराओं का उल्लंघन किया है।

आज लाखों लोग इस नए कानून से प्रभावित हो रहे हैं लेकिन उनकी बातों को अनसुना किया जा रहा है। सरकार अपनी जिद्द पर अड़ी हुई है। सरकार से कोई गलती होती है तो उसका कर्तव्य है कि वह इसे स्वीकार भी करे। यशवंत सिन्हा ने प्रेस क्लब में जेपी फाउंडेशन और सुनील मेमोरियल ट्रस्ट की ओर से आयोजित एक कार्यक्रम में अपने वीडियो संदेश के जरिये ये बातें कहीं। 

 ‘भारत में कृषि कानून, खाद्य सुरक्षा और लोकतंत्र’ विषय पर आयोजित इस परिचर्चा में वीडियो संदेश के जरिये शामिल हुए वरिष्ठ अर्थशास्त्री और प्रोफेसर अरुण कुमार ने कहा कि पूरा देश तमाम हिस्सों से दिल्ली की सीमाओं पर आए किसानों का संघर्ष देख रहा है। कृषि कानूनों को जबरन किसानों पर और देश पर थोपने का जो तरीका सरकार अपना रही है वह लोकतंत्र के खिलाफ और किसान विरोधी है। 

जांच एजेंसियां आंदोलनकारियों को निशाना बना रही है
वरिष्ठ पत्रकार आशुतोष ने कहा कि किसी भी सरकार की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह उसकी नीतियों और कानूनों का विरोध करने वालों या इसपर सवाल उठाने वालों से बात करे और अगर जरूरत हो तो अपने ही देश के किसानों की मांगों पर झुकने में कोई बुराई नहीं है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से जो कुछ लोग बोलना चाह रहे हैं या बोल रहे हैं सरकार न तो उनकी बातें सुनना चाहती है न ही उनसे किसी प्रकार का संवाद करना चाहती है।

सत्ता में बैठे लोग इस आंदोलन को नक्सल और गद्दारी से जोड़कर बदनाम कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि जैसा शाहीन बाग आंदोलन के साथ हुआ, सरकार किसानों के साथ भी वही रवैया अपना रही है और किसानों को दलाल और खालिस्तानी तक कहा जा रहा है। जांच एजेंसियां आंदोलनकारियों को निशाना बना रही हैं।

गांधीवादी विचारक सत्या साहू ने कहा कि आज जो किसानों का आंदोलन हो रहा है वो इतिहास को दोहरा रहा है। गांधीजी के समय हुए अहिंसक आंदोलनों की याद दिला रहा है। सरकार ने राज्यसभा में विपक्ष के विरोध के बाद में भी ये कानून पारित करवा लिया। लोकतंत्र का मखौल उड़ाते हुए ये कदम उठाया गया है और आज एक बार फिर गांधीवादी तरीके से संघर्ष कर रहे किसानों ने उस दौर की याद दिला दी है।

पत्रकार भाषा सिंह ने कहा कि इस ऐतिहासिक आंदोलन ने देश के दो बड़े कॉरपोरेट घराने का चैन छीन लिया है। ये आंदोलन लोकतंत्र के खंभे को चैलेंज कर रहा है। ये पहला आंदोलन है जिसमें मीडिया पर हमला हुआ। लोकतंत्र कैसे बचेगा ये आंदेालन ने हमें सिखाया है। इस आंदोलन ने ये भी बताया कि कृषि में महिला किसानों की क्या भागदीरी है।

आंदोलन में शामिल महिलाएं खेती किसानी के अलावा बिजली, इकोनाॅमी और राजनीति पर चर्चा कर रही है। महिलाओं और युवाओं ने नया नैरेटिव सेट कर दिखाया है। आज किसान विपक्षी दलों से भी सवाल कर रहे हैं कि इस महत्वपूर्ण मसले पर कोई सर्वदलीय बैठक क्यों नहीं हो रही है। किसान नेताओं का आरोप है कि सरकार हमारे इस पूरे मूवमेंट को साजिश में तब्दील करने की सोच रही है।   

वरिष्ठ वकील अशोक पांडा का कहना था कि सरकार को अपनी जिद छोड़कर किसानों से उनके मुद्दों पर खुलकर बात करनी चाहिए। किसानों की सभी मांगों को माननी चाहिए। इसके अलावा स्वामीनाथन कमेटी की सिफारिशों को लागू करना चाहिए। इससे पूरे देश के किसानों के साथ न्याय हो सकेगा। 

किसान दिल्ली वालों का दर्द समझते हैं, लेकिन मजबूर हैं
कार्यक्रम में राष्ट्रीय किसान मजदूर संघ मध्यप्रदेश के अध्यक्ष राहुल राज ने कहा कि किसान कृषि सुधारों के विरोध में नहीं है। लेकिन ऐसे सुधार नहीं हो जो किसानों को ही बर्बाद कर दे। आज दिल्ली की जनता को जो दर्द हो रहा है वह हम लोग भी समझते हैं। इसलिए हम लोग शांति से बैठकर अपना आंदोलन कर रहे हैं।

हमारी मांगे बुनियादी हैं लेकिन सरकार इसे मानने को ही तैयार नहीं है। आज हम किसानों के साथ आम उपभोक्ताओं की भी लड़ाई लड़ रहे हैं। लेकिन आज तक सरकार हमारी पीड़ा सुनने को तैयार नहीं हुई। आज सरकार हमें पूरी तरह से बदनाम करने में लगी हुई है। 26 जनवरी के दिन हम परेड़ में कोई व्यवधान नहीं डालेंगे। सभी किसान दिल्ली के आउंटर रिंगरोड पर ट्रैक्टर मार्च निकालेंगे। 

कार्यक्रम की अध्यक्षता और संचालन करते हुए वरिष्ठ पत्रकार और चिंतक एन आर मोहंथी ने किसान आंदोलन के प्रति सरकार के रवैये पर तीखी टिप्पणी की और 1988 की याद दिलाते हुए कहा कि तब बोट क्लब पर किसानों की विशाल रैली हुई थी और तत्कालीन सरकार ने इसे नहीं रोका था, लेकिन आज ‘भारी बहुमत वाली’ सरकार किसानों को दिल्ली में घुसने की इजाजत तक नही दे रही है।

लोकतंत्र का आज मजाक बन गया है। किसानों ने अपने शांतिपूर्ण आंदोलन से साबित कर दिया है कि देश की जनता इस सरकार की जनविरोधी रवैये को किसी भी हालत में मंजूर नहीं कर सकती। जेपी फाउंडेशन की ओर से धन्यवाद ज्ञापन करते हुए शशि शेखर ने कहा कि आज किसानों के आंदोलन को देखकर जेपी आंदोलन की याद ताजा हो गई है।

पूर्व केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा ने दिल्ली की सीमाओं पर करीब दो महीने से डटे किसानों की मांगों का समर्थन किया है और सरकार की जिद और किसान विरोधी रवैये की कड़ी निंदा की है। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार पहले बगैर किसी से विचार विमर्श किए तीनों अध्यादेश लेकर आई बाद में संसद से इसे जोर जबरदस्ती से पारित करवा लिया। इस सरकार ने लोकतंत्र और उसकी परंपराओं का उल्लंघन किया है।

आज लाखों लोग इस नए कानून से प्रभावित हो रहे हैं लेकिन उनकी बातों को अनसुना किया जा रहा है। सरकार अपनी जिद्द पर अड़ी हुई है। सरकार से कोई गलती होती है तो उसका कर्तव्य है कि वह इसे स्वीकार भी करे। यशवंत सिन्हा ने प्रेस क्लब में जेपी फाउंडेशन और सुनील मेमोरियल ट्रस्ट की ओर से आयोजित एक कार्यक्रम में अपने वीडियो संदेश के जरिये ये बातें कहीं। 

 ‘भारत में कृषि कानून, खाद्य सुरक्षा और लोकतंत्र’ विषय पर आयोजित इस परिचर्चा में वीडियो संदेश के जरिये शामिल हुए वरिष्ठ अर्थशास्त्री और प्रोफेसर अरुण कुमार ने कहा कि पूरा देश तमाम हिस्सों से दिल्ली की सीमाओं पर आए किसानों का संघर्ष देख रहा है। कृषि कानूनों को जबरन किसानों पर और देश पर थोपने का जो तरीका सरकार अपना रही है वह लोकतंत्र के खिलाफ और किसान विरोधी है। 

जांच एजेंसियां आंदोलनकारियों को निशाना बना रही है

वरिष्ठ पत्रकार आशुतोष ने कहा कि किसी भी सरकार की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह उसकी नीतियों और कानूनों का विरोध करने वालों या इसपर सवाल उठाने वालों से बात करे और अगर जरूरत हो तो अपने ही देश के किसानों की मांगों पर झुकने में कोई बुराई नहीं है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से जो कुछ लोग बोलना चाह रहे हैं या बोल रहे हैं सरकार न तो उनकी बातें सुनना चाहती है न ही उनसे किसी प्रकार का संवाद करना चाहती है।

सत्ता में बैठे लोग इस आंदोलन को नक्सल और गद्दारी से जोड़कर बदनाम कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि जैसा शाहीन बाग आंदोलन के साथ हुआ, सरकार किसानों के साथ भी वही रवैया अपना रही है और किसानों को दलाल और खालिस्तानी तक कहा जा रहा है। जांच एजेंसियां आंदोलनकारियों को निशाना बना रही हैं।

गांधीवादी विचारक सत्या साहू ने कहा कि आज जो किसानों का आंदोलन हो रहा है वो इतिहास को दोहरा रहा है। गांधीजी के समय हुए अहिंसक आंदोलनों की याद दिला रहा है। सरकार ने राज्यसभा में विपक्ष के विरोध के बाद में भी ये कानून पारित करवा लिया। लोकतंत्र का मखौल उड़ाते हुए ये कदम उठाया गया है और आज एक बार फिर गांधीवादी तरीके से संघर्ष कर रहे किसानों ने उस दौर की याद दिला दी है।


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arvind007

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