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ग्राउंड रिपोर्ट बलरामपुर: जागरूकता की कमी और गरीबी से मुरझा रही बच्चों की सेहत

बच्चे के साथ रीना
– फोटो : अमर उजाला

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जिस देश में पांच साल से नीचे होने वाली बच्चों की मौतों में दो तिहाई की मौतें कुपोषण से होती हैं, इन हालात में आंगनबाड़ी का महत्व काफी बढ़ जाता है, लेकिन चक्रव्यूह में फंसी सरकारी योजनाएं, जानकारी का अभाव और ग्रामीण राजनीति के फेर में फंसे आंगनबाड़ी केन्द्र बच्चों और गर्भवती महिलाओं का कुपोषण दूर कर पाने में असहाय साबित हो रहे हैं।

बलरामपुर जिले के आंगनबाड़ी केन्द्रों में अधिकतर में बच्चों और गर्भवती महिलाओं का वजन मापने की मशीनें ही खराब हैं। बलरामपुर सदर के सीडीपीओ सत्येन्द्र सिंह कहते हैं, ‘वजन करने की मशीनें 2014 में मिली थीं। अब डब्ल्यूएचओ के चार्ट से वजन निकालते हैं। एमयूएसी टेप से वजन निकाल लेते हैं। इसमें बच्चे की भुजा का बीच का हिस्सा नापने पर अगर 11.5 सेमी से कम है तो कुपोषित कैटेगरी का होता है।

देश में बाल विवाह के मामले में सबसे ऊपर श्रावस्ती जिले के सिरसिया ब्लॉक की वनमसहा गांव की रिंकी रानी को गांव के बच्चों को कुपोषण मुक्त करने के लिए अवार्ड इसलिए मिला कि उन्होंने महिलाओं को खानपान के लिए जागरुक करने के साथ ही प्राकृतिक तरीके से स्वस्थ रहना सिखाया, लेकिन रिंकी पोषाहार की व्यवस्था में हुए बदलाव को सही नहीं मानतीं। कहती हैं, इधर चावल और गेहूं पैक होकर आने लगा है, दाल नहीं आई है। बोल रहे हैं कि घी दूध भी आएगा, लेकिन लाभार्थियों को बराबर राशन नहीं मिल पा रहा। बड़ी दिक्कत हो रही है। पंजीरी आती थी तो सभी को बराबर-बराबर बांट देते थे।

प्रदेश में पोषाहार की नई व्यवस्था के अनुसार अब आंगनबाड़ियों में मिलने वाले पौष्टिक आहार की जगह 06 माह से 03 वर्ष तक के बच्चों को डेढ़ किलो गेहूं, एक किलो चावल और 750 ग्राम दाल का एक पैकेट दिया जाता है। देसी घी 450 ग्राम, स्किमड दूध 400 ग्राम, गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं को दो किलो गेहूं, चावल एक किलो, 750 ग्राम दाल, स्किम्ड मिल्क 750 ग्राम, घी 450 ग्राम। गेहूं-चावल स्वयं सहायता समूह की महिलाओं को कोटेदार से और दाल बाजार से खरीद कर पैकेट बनाकर आंगनबाड़ी कार्यकर्ता को सौंपना होता है।

इस व्यवस्था से परेशान श्रावस्ती जिले के कठकुइयां गांव की आंगनबाड़ी कार्यकर्ता अखिलेश कुमारी बताती हैं, गांव की 2300 की आबादी में 76 राशन किट बनती हैं। जिन्हें राशन नहीं मिल पाता वो लड़ाई पर उतारु हो जाते हैं। अधिकारी कहते हैं जितना आया है उतना ही बांट दो। पिछले दो माह में दूध-घी भी नहीं मिला, ऊपर से बताया गया कि आने वाला है।

बलरामपुर जिले के एक सीडीपीओ कहते हैं कि लोगों के शामिल होने से किसी एक की जवाबदेही नहीं रह गई है। समूह की महिलाएं कहती हैं कि कोटेदार ने राशन कम दिया, कोटेदार कहता है ऊपर से कम आया, आंगनबाड़ी कार्यकत्री कहती हैं कि समूह से मिले पैकेट में राशन कम मिला। सब एक दूसरे के ऊपर थोपते रहते हैं। समूह की महिलाओं को ट्रेनिंग न देने से भी दिक्कत आ रही है।

नहीं हो पाती मॉनीटरिंग
सीडीपीओ आगे बताते हैं, ‘बच्चे को पौष्टिक भोजन उसकी उम्र के हिसाब से खिलाया जाता है, जो आंगनबाड़ी केन्द्रों पर ही बन सकता है। अब हॉट कुक्ड भोजन को एमडीएम से जोड़ दिया गया। जो कभी बन ही नहीं पाता। पहले जो बच्चों को दिया जाता था वो पौष्टिकता बराबर रखी जाती थी। अब गेहूं या चावल में एक ही चीज मिलेगी। अलग-अलग मॉनीटरिंग भी नहीं हो पाती सो अलग।’

कठकुइयां गांव में आंगनबाड़ी केन्द्र पर मौजूद शिवगुरु स्वयं सहायता समूह की सदस्य शशि राना ने बताया कि समूह की कुल 14 महिलाओं ने 76 राशन के पैकेट बनाए। दाल खरीद आदि के बारे में पूछने पर कहा, ‘हमारी बच्ची छोटी है, इसलिए घर का दूसरा सदस्य काम पर जाता है।’ कठकुइयां गांव की ही रीता देवी का बच्चा जब पैदा हुआ तो एक किलो का था, एनआरसी में भर्ती कराने के बाद ठीक हुआ, लेकिन उन्हें पिछले दो माह से राशन का पैकेट नहीं मिला।

बलरामपुर देहात के सीडीपीओ राकेश वर्मा इस व्यवस्था पर कहते हैं, ‘जितनी चेन लंबी होगी, उतनी ही को-ऑर्डिनेशन में दिक्कत आती है। जब दफ्तर ही मेंटेन नहीं तो व्यवस्था कैसे मेंटने होगी?’ श्रावस्ती और बलरामपुर के जितने भी आंगनबाड़ी केन्द्रों की हालत खस्ता मिली, यहां तक सीडीपीओ आफिस ही किराए पर चल रहे हैं। बलरामपुर के रहरा, उतरौला, बलरामपुर शहर, तुलसीपुर समेत कई सीडीपीओ आफिस किराए पर चल रहे हैं। यही हाल श्रावस्ती के आंगनबाड़ी केन्द्रों की है।

बलरामपुर जिले के एक सीडीपीओ कहते हैं, ‘हम अगर कोई मीटिंग करना चाहें तो हमारे पास हॉल तक नहीं है। जबकि कोरोनाकाल में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग करना तो दूर की बात। हमें मीटिंग के लिए हाल बुक करने के लिए विकास भवन के चक्कर काटने पड़ते हैं।’

बलरामपुर देहात के सीडीपीओ राकेश वर्मा कहते हैं कि प्रधानजी के घुसने से व्यवस्था और चौपट हो गई है। पहले मातृ समिति में पैसे आते थे, अब आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और प्रधान के ज्वाइंट अकाउंट में पैसा आता है, जरूरत का सामान खरीदने के लिए प्रधान के खाते से पैसा निकालना मुश्किल हो जाता है।

क्या कहते हैं अधिकारी
स्वयं सहायता समूहों के ज़ुड़ने से बेहतर तरीके से काम होना मानते हुए श्रावस्ती के जिलाधिकारी टीके शिबु कहते हैं, ‘गेहूं-चावल के अलावा बच्चों को दिया जाने वाला घी व अन्य चीजें त्रैमासिक रूप से उपलब्ध कराने का निर्णय लिया गया है। जिले में 0 से 5 साल के कुल 1.30 लाख बच्चों में अति कुपोषित 2716 हैं, जबकि मॉडरेट कुपोषित 4085 हैं, 20,000 पीली श्रेणी के बच्चे हैं। आंगनबाड़ी कार्यकत्रियां, आशा और एएनएम डीएचएनडी दिवस पर बच्चों के खान-पान और अन्य चीजों की जानकारी देती हैं, जिले में बाल विवाह पर लगाम लगी है।’

श्रावस्ती में पांच साल से कम बच्चों का स्वास्थ्य

  • 63.5 फीसदी बच्चे उम्र के हिसाब से कम ऊंचाई के (स्टंटेड)।
  • 10.1 फीसदी बच्चों का ऊंचाई के हिसाब से वजन कम (वेस्टेड)।
  • 39.2 फीसदी बच्चों का वजन उम्र के हिसाब से कम।
  • 69.9 फीसदी छह माह से पांच साल तक के बच्चे एनीमिया के शिकार।

श्रावस्ती में महिलाओं का स्वास्थ्य

  • 48.2 फीसदी महिलाएं (15-49 साल तक) एनीमिया से पीड़ित।
  • 39.9 फीसदी गर्भवती महिलाएं (15-49 साल तक) एनीमिया से पीड़ित।
(स्रोत: नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे 2015-16)

बलरामपुर में पांच साल से कम बच्चों का स्वास्थ्य

  • 62.8 फीसदी बच्चे उम्र के हिसाब से कम ऊंचाई के (स्टंटेड)।
  • 10.3 फीसदी बच्चों का ऊंचाई के हिसाब से वजन कम (वेस्टेड)।
  • 43.3 फीसदी बच्चों का वजन उम्र के हिसाब से कम।
  • 72.4 फीसदी छह माह से पांच साल तक के बच्चे एनीमिया के शिकार।
बलरामपुर में महिलाओं का स्वास्थ्य
55.8 फीसदी महिलाएं (15-49 साल तक) एनीमिया से पीड़ित।
55.3 फीसदी गर्भवती महिलाएं (15-49 साल तक) एनीमिया से पीड़ित।

(स्रोत: नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे: 2015-16)

जिस देश में पांच साल से नीचे होने वाली बच्चों की मौतों में दो तिहाई की मौतें कुपोषण से होती हैं, इन हालात में आंगनबाड़ी का महत्व काफी बढ़ जाता है, लेकिन चक्रव्यूह में फंसी सरकारी योजनाएं, जानकारी का अभाव और ग्रामीण राजनीति के फेर में फंसे आंगनबाड़ी केन्द्र बच्चों और गर्भवती महिलाओं का कुपोषण दूर कर पाने में असहाय साबित हो रहे हैं।

बलरामपुर जिले के आंगनबाड़ी केन्द्रों में अधिकतर में बच्चों और गर्भवती महिलाओं का वजन मापने की मशीनें ही खराब हैं। बलरामपुर सदर के सीडीपीओ सत्येन्द्र सिंह कहते हैं, ‘वजन करने की मशीनें 2014 में मिली थीं। अब डब्ल्यूएचओ के चार्ट से वजन निकालते हैं। एमयूएसी टेप से वजन निकाल लेते हैं। इसमें बच्चे की भुजा का बीच का हिस्सा नापने पर अगर 11.5 सेमी से कम है तो कुपोषित कैटेगरी का होता है।

देश में बाल विवाह के मामले में सबसे ऊपर श्रावस्ती जिले के सिरसिया ब्लॉक की वनमसहा गांव की रिंकी रानी को गांव के बच्चों को कुपोषण मुक्त करने के लिए अवार्ड इसलिए मिला कि उन्होंने महिलाओं को खानपान के लिए जागरुक करने के साथ ही प्राकृतिक तरीके से स्वस्थ रहना सिखाया, लेकिन रिंकी पोषाहार की व्यवस्था में हुए बदलाव को सही नहीं मानतीं। कहती हैं, इधर चावल और गेहूं पैक होकर आने लगा है, दाल नहीं आई है। बोल रहे हैं कि घी दूध भी आएगा, लेकिन लाभार्थियों को बराबर राशन नहीं मिल पा रहा। बड़ी दिक्कत हो रही है। पंजीरी आती थी तो सभी को बराबर-बराबर बांट देते थे।


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पोषाहार की नई व्यवस्था जटिल

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arvind007

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