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क्या ज्यादा MSP के लालच में किसानों ने बढ़ाया धान-गेहूं का उत्पादन? जानिए क्या कहते हैं आंकड़े

बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Tue, 05 Jan 2021 05:02 PM IST

न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP)
– फोटो : iStock

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नए कृषि कानूनों पर सरकार भले ही आत्मविश्वास से भरी है, लेकिन देश के अन्नदाता इसका विरोध कर रहे हैं। न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) को लेकर किसान संगठनों में नाराजगी है। न्यूनतम समर्थन मूल्य के तहत सरकार किसानों द्वारा बेचे जाने वाले अनाज की पूरी मात्रा खरीदने के लिए तैयार रहती है। इसका सबसे ज्यादा लाभ पंजाब और हरियाणा के किसानों ने उठाया है। लेकिन आंकड़ों से पता चलता है कि पंजाब के किसानों ने ज्यादा एमएसपी के लालच में केवल गेहूं-धान की फसलों के उत्पादन को ही प्रमुखता दी है और अन्य फसलों का उत्पादन बहुत कम कर दिया है।

धान और गेहूं का उत्पादन बढ़ा 

  • आंकड़ों के मुताबिक पंजाब में धान का उत्पादन 1960-61 के 4.8 फीसदी से बढ़कर 2018-19 में 39.6 फीसदी हो गया।
  • इसी प्रकार पंजाब ने गेहूं के उत्पादन में 27.3 से 44.9 फीसदी तक की शानदार बढ़ोतरी की। 
  • कृषि एवं किसान कल्याण विभाग, पंजाब से प्राप्त जानकारी के अनुसार 1960-61 के समय पंजाब में कुल फसल उत्पादन का 4.8 फीसदी हिस्सा धान का हुआ करता था, जो हरित आंदोलन अपनाए जाने के बाद 1970-71 में 6.9 फीसदी, 1980-81 में 17.5 फीसदी, 1990-91 में 26.9 फीसदी, 2000-01 में 31.3 फीसदी और 2018-19 में 39.6 फीसदी हो गया।
  • इसी प्रकार गेहूं के उत्पादन में भी रिकॉर्ड बढ़ोतरी हुई। जानकारी के मुताबिक 1960-61 में पंजाब में 27.3 फीसदी उत्पादन गेहूं का हुआ करता था, जो 1970-71 में 40.5 फीसदी, 2000-01 में 43.1 फीसदी, 2018-19 में 44.9 फीसदी हो गया।

इन फसलों के उत्पादन में आई कमी

  • इसी दौरान अन्य फसलों के उत्पादन में रिकॉर्ड कमी दर्ज की गई। 1960 के दशक की तुलना में 2018-19 में मक्का का उत्पादन 6.9 फीसदी से 1.4 फीसदी हो गया। 
  • इसी प्रकार तेल उत्पादक फसलों का उत्पादन 3.9 फीसदी से 0.5 फीसदी हो गया। 
  • कपास की फसल का उत्पादन 9.4 फीसदी से 5.1 फीसदी हो गया। 
  • अन्य फसलों का उत्पादन 17.7 फीसदी से घटकर 2.4 फीसदी हो गया।
  • दालों का उत्पादन 19 फीसदी से घटकर केवल 0.4 फीसदी रह गया।

लगातार नीचे जा रहा है जलस्तर 
चूंकि किसान गेहूं और धान की फसलों के उत्पाद को ज्यादा महत्व दे रहे हैं, ऐसे में जल विशेषज्ञों ने कहा है कि इससे यहां की जलशक्ति का बहुत ज्यादा उपयोग हो रहा है। यानी इन राज्यों में जलस्तर लगातार नीचे जा रहा है और यह बड़ी चिंता का विषय बना हुआ है। इसलिए अगर किसान गेहूं और धान की पारंपरिक फसलों की बजाय अन्य फसलों का उत्पादन करेंगे, तो इससे आर्थिक लाभ में वृद्धि होगी और जल शक्ति की भी बचत होगी।

क्या किसानों को ही हो रहा वास्तविक नुकसान?
इस संदर्भ में द इंडियन एग्रीकल्चर रिसर्च इंस्टीट्यूट यानी पूसा इंस्टीट्यूट के वरिष्ठ वैज्ञानिक अनिल दुबे ने अमर उजाला को बताया कि किसी भी खेत में एक ही प्रकार की फसल को लगातार बोने से उसकी मृदा शक्ति कमजोर होती है। इससे इस फसल की उत्पादकता में भी कमी आती है। अलग-अलग फसलों की जड़ों की लंबाई अलग-अलग होती है। जिस प्रकार की जड़ वाली फसल लगातार बोई जाती है, मिट्टी के उस स्तर पर उर्वरता कम होती चली जाती है, जबकि मिट्टी के अलग स्तर पर उर्वरता बनी रहती है।

किसानों को क्या करना चाहिए?
अगर एक बार गहरी जड़ वाली और दूसरी बार मध्यम या लघु जड़ वाली फसल बोई जाए तो अलग-अलग स्तर की उर्वरता का उपयोग होता है, साथ ही दो फसलों के बीच में एक स्तर की मिट्टी को अपनी उर्वरता फिर से प्राप्त करने का समय मिल जाता है। इससे अलग-अलग फसलों को बोने से मिट्टी की उर्वरता और उत्पादकता बरकरार रहती है। जबकि एक ही प्रकार की फसल बोने से उर्वरता दुबारा नहीं प्राप्त हो पाती और इसमें कमी आती है।

नए कृषि कानूनों पर सरकार भले ही आत्मविश्वास से भरी है, लेकिन देश के अन्नदाता इसका विरोध कर रहे हैं। न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) को लेकर किसान संगठनों में नाराजगी है। न्यूनतम समर्थन मूल्य के तहत सरकार किसानों द्वारा बेचे जाने वाले अनाज की पूरी मात्रा खरीदने के लिए तैयार रहती है। इसका सबसे ज्यादा लाभ पंजाब और हरियाणा के किसानों ने उठाया है। लेकिन आंकड़ों से पता चलता है कि पंजाब के किसानों ने ज्यादा एमएसपी के लालच में केवल गेहूं-धान की फसलों के उत्पादन को ही प्रमुखता दी है और अन्य फसलों का उत्पादन बहुत कम कर दिया है।

धान और गेहूं का उत्पादन बढ़ा 

  • आंकड़ों के मुताबिक पंजाब में धान का उत्पादन 1960-61 के 4.8 फीसदी से बढ़कर 2018-19 में 39.6 फीसदी हो गया।
  • इसी प्रकार पंजाब ने गेहूं के उत्पादन में 27.3 से 44.9 फीसदी तक की शानदार बढ़ोतरी की। 
  • कृषि एवं किसान कल्याण विभाग, पंजाब से प्राप्त जानकारी के अनुसार 1960-61 के समय पंजाब में कुल फसल उत्पादन का 4.8 फीसदी हिस्सा धान का हुआ करता था, जो हरित आंदोलन अपनाए जाने के बाद 1970-71 में 6.9 फीसदी, 1980-81 में 17.5 फीसदी, 1990-91 में 26.9 फीसदी, 2000-01 में 31.3 फीसदी और 2018-19 में 39.6 फीसदी हो गया।
  • इसी प्रकार गेहूं के उत्पादन में भी रिकॉर्ड बढ़ोतरी हुई। जानकारी के मुताबिक 1960-61 में पंजाब में 27.3 फीसदी उत्पादन गेहूं का हुआ करता था, जो 1970-71 में 40.5 फीसदी, 2000-01 में 43.1 फीसदी, 2018-19 में 44.9 फीसदी हो गया।

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