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कोरोना ने तोड़ दी कामकाजी अमेरिकी महिलाओं की कमर, रोजगार में भागीदारी घट कर 33 साल के सबसे निचले स्तर पर पहुंची

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अमेरिका में कोरोना महामारी के दौरान दस लाख से ज्यादा महिलाओं को अपना रोजगार छोड़ना पड़ा। उनमें बहुत बड़ी संख्या ऐसी हैं, जिनके फिर से कामकाज में लौटने की संभावना नहीं है। जानकारों ने कहा है कि इस तरह महिलाओं को घर से बाहर लाकर रोजगार में लगाने की दशकों की मेहनत पर इस महामारी ने पानी फेर दिया है। अमेरिकी समाज का प्रगतिशील खेमा कोरोना महामारी के इन खतरनाक नतीजों को लेकर चिंतित है।

आंकड़ों के मुताबिक पिछले साल फरवरी में महिलाओं ने एक बड़ा मुकाम तय किया था। तब अमेरिका में ऐसा पहली बार हुआ, जब गैर- कृषि नौकरियों में महिलाओं की संख्या पुरुषों से ज्यादा हो गई। लेकिन अब एक साल बाद रोजगार में महिलाओं की भागीदारी 33 साल के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई है।

टीवी चैनल सीएनबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक जनवरी में 2.75 लाख और महिलाएं लेबर फोर्स (श्रम शक्ति) से अलग हो गईं। पिछले महीने जितने कर्मचारियों की नौकरी गई, उनमें 80 फीसदी महिलाएं थीं। अमेरिका के नेशनल वीमेन्स लॉ सेंटर के मुताबिक अब लेबर फोर्स में महिलाओं की भागीदारी की दर 57 फीसदी तक आ गई है। 1988 के बाद यह दर इतनी कम कभी नहीं थी।

कई विशेषज्ञों ने कहा है कि जो महिलाएं अपने करियर के चरम पर थीं, उनके घर बैठ जाने का अमेरिका की अर्थव्यवस्था पर बहुत बुरा असर होगा। नौकरियों से संबंधित वेबसाइट इनडीड के मुख्य अर्थशास्त्री जेड कोल्को ने वेबसाइट एक्सियोस.कॉम से कहा कि रोजगार के मामले में पुरुषों और महिलाओँ के बीच जो खाई पैदा हुई है, उसका कारण महामारी को लेकर उनका अलग-अलग अनुभव है। बच्चों की देखभाल महिलाओं के घर बैठने का एक बड़ा कारण है।

कोल्को के मुताबिक अगर 25 से 54 वर्ष की उम्र की उन महिलाओं पर ध्यान दें, जिनके बच्चे नहीं हैं, तो उनका 4.8 फीसदी हिस्सा रोजगार से बाहर हुआ है। इस उम्र वर्ग के रोजगार से बाहर होने वाले पुरुषों का अनुपात भी लगभग यही है। लेकिन जो महिलाएं मां हैं, उनमें 5.7 फीसदी नौकरी से बाहर गई हैं।

कोल्को के मुताबिक डिस्टेंस लर्निंग, ऑनलाइन पढ़ाई और बच्चों की देखभाल का महिलाओं पर ज्यादा बोझ पड़ा। इसकी वजह से बहुत सी महिलाओं ने नौकरी छोड़ दी है या नौकरी जाने के बाद वे नई नौकरी की तलाश नहीं कर रही हैं। दूसरे जानकारों ने कहा है कि महामारी खत्म होने के बाद भी महिलाओं पर आज के हालात का बुरा असर लंबे समय तक कायम रहेगा।

वेबसाइट एक्सियोस की रिपोर्ट में बताया गया है कि महामारी के पहले कम वेतन पर काम करने वाली सिंगल मदर्स में ऐसी बहुत सी हैं, जिनके सामने अब खाना और घर का किराया चुकाने की समस्या खड़ी हो गई है। इन महिलाओं के पास इतनी बचत नहीं थी, जिससे वे लंबे समय तक गुजारा कर सकें। यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन की अर्थशास्त्री बेटसी स्टीवेंसन के मुताबिक ऊंचे पदों पर काम करने वाली महिलाओं के संदर्भ में ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जब उन महिलाओं ने प्रमोशन लेने से इनकार कर दिया।

उन्होंने अपनी कंपनियों को बताया कि बच्चों के पालन-पोषण की बड़ी जिम्मेदारी के साथ प्रमोशन के साथ बढ़ने वाली दफ्तरी जिम्मेदारी वे नहीं निभा पाएंगी। स्टीवेन्सन के मुताबिक करियर चुनने या अपनी नई जिंदगी शुरू करने के फैसले लेने के मामले में कोरोना महामारी के अनुभव का असर अगली पीढ़ी की महिलाओं पर भी पड़ सकता है।

सार

डिस्टेंस लर्निंग, ऑनलाइन पढ़ाई और बच्चों की देखभाल का महिलाओं पर ज्यादा बोझ पड़ा। इसकी वजह से बहुत सी महिलाओं ने नौकरी छोड़ दी है या नौकरी जाने के बाद वे नई नौकरी की तलाश नहीं कर रही हैं…

विस्तार

अमेरिका में कोरोना महामारी के दौरान दस लाख से ज्यादा महिलाओं को अपना रोजगार छोड़ना पड़ा। उनमें बहुत बड़ी संख्या ऐसी हैं, जिनके फिर से कामकाज में लौटने की संभावना नहीं है। जानकारों ने कहा है कि इस तरह महिलाओं को घर से बाहर लाकर रोजगार में लगाने की दशकों की मेहनत पर इस महामारी ने पानी फेर दिया है। अमेरिकी समाज का प्रगतिशील खेमा कोरोना महामारी के इन खतरनाक नतीजों को लेकर चिंतित है।

आंकड़ों के मुताबिक पिछले साल फरवरी में महिलाओं ने एक बड़ा मुकाम तय किया था। तब अमेरिका में ऐसा पहली बार हुआ, जब गैर- कृषि नौकरियों में महिलाओं की संख्या पुरुषों से ज्यादा हो गई। लेकिन अब एक साल बाद रोजगार में महिलाओं की भागीदारी 33 साल के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई है।

टीवी चैनल सीएनबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक जनवरी में 2.75 लाख और महिलाएं लेबर फोर्स (श्रम शक्ति) से अलग हो गईं। पिछले महीने जितने कर्मचारियों की नौकरी गई, उनमें 80 फीसदी महिलाएं थीं। अमेरिका के नेशनल वीमेन्स लॉ सेंटर के मुताबिक अब लेबर फोर्स में महिलाओं की भागीदारी की दर 57 फीसदी तक आ गई है। 1988 के बाद यह दर इतनी कम कभी नहीं थी।

कई विशेषज्ञों ने कहा है कि जो महिलाएं अपने करियर के चरम पर थीं, उनके घर बैठ जाने का अमेरिका की अर्थव्यवस्था पर बहुत बुरा असर होगा। नौकरियों से संबंधित वेबसाइट इनडीड के मुख्य अर्थशास्त्री जेड कोल्को ने वेबसाइट एक्सियोस.कॉम से कहा कि रोजगार के मामले में पुरुषों और महिलाओँ के बीच जो खाई पैदा हुई है, उसका कारण महामारी को लेकर उनका अलग-अलग अनुभव है। बच्चों की देखभाल महिलाओं के घर बैठने का एक बड़ा कारण है।

कोल्को के मुताबिक अगर 25 से 54 वर्ष की उम्र की उन महिलाओं पर ध्यान दें, जिनके बच्चे नहीं हैं, तो उनका 4.8 फीसदी हिस्सा रोजगार से बाहर हुआ है। इस उम्र वर्ग के रोजगार से बाहर होने वाले पुरुषों का अनुपात भी लगभग यही है। लेकिन जो महिलाएं मां हैं, उनमें 5.7 फीसदी नौकरी से बाहर गई हैं।

कोल्को के मुताबिक डिस्टेंस लर्निंग, ऑनलाइन पढ़ाई और बच्चों की देखभाल का महिलाओं पर ज्यादा बोझ पड़ा। इसकी वजह से बहुत सी महिलाओं ने नौकरी छोड़ दी है या नौकरी जाने के बाद वे नई नौकरी की तलाश नहीं कर रही हैं। दूसरे जानकारों ने कहा है कि महामारी खत्म होने के बाद भी महिलाओं पर आज के हालात का बुरा असर लंबे समय तक कायम रहेगा।

वेबसाइट एक्सियोस की रिपोर्ट में बताया गया है कि महामारी के पहले कम वेतन पर काम करने वाली सिंगल मदर्स में ऐसी बहुत सी हैं, जिनके सामने अब खाना और घर का किराया चुकाने की समस्या खड़ी हो गई है। इन महिलाओं के पास इतनी बचत नहीं थी, जिससे वे लंबे समय तक गुजारा कर सकें। यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन की अर्थशास्त्री बेटसी स्टीवेंसन के मुताबिक ऊंचे पदों पर काम करने वाली महिलाओं के संदर्भ में ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जब उन महिलाओं ने प्रमोशन लेने से इनकार कर दिया।

उन्होंने अपनी कंपनियों को बताया कि बच्चों के पालन-पोषण की बड़ी जिम्मेदारी के साथ प्रमोशन के साथ बढ़ने वाली दफ्तरी जिम्मेदारी वे नहीं निभा पाएंगी। स्टीवेन्सन के मुताबिक करियर चुनने या अपनी नई जिंदगी शुरू करने के फैसले लेने के मामले में कोरोना महामारी के अनुभव का असर अगली पीढ़ी की महिलाओं पर भी पड़ सकता है।

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