Uttar Pradesh

किसान नेता बोले, मीठा चारा फेंक रही सरकार पर कैसे करें ऐतबार?

किसान नेताओं और सरकार की बैठक
– फोटो : अमर उजाला (फाइल)

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केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने अगले डेढ़ साल तक तीनों कृषि कानूनों को निलंबित रखने का प्रस्ताव जरूर दिया है, लेकिन किसान संगठन केन्द्र सरकार पर ऐतबार नहीं कर पा रहे हैं। किसान संगठन आज दो बंजे सिंघु बॉर्डर पर मैराथन बैठक कर आंदोलन के भविष्य, सरकार के प्रस्ताव और अपनी मांगों पर एकजुटता बनाने की रणनीति पर निर्णय लेंगे। फिलहाल किसानों की मंशा केन्द्र सरकार के मीठे जाल में फंसने की नहीं है। उनका कहना है कि सरकार की मंशा ठीक नहीं है। वह कभी हमें राष्ट्र विरोधी, कभी खालिस्तानी और कभी कुछ बताती है। कभी हमारे आंदोलन को बड़े किसानों का आंदोलन बताती है। इसलिए इस बार हम अंतिम निर्णय लेकर ही जाएंगे।

किसान नेता गुरनाम सिंह चढ़ूनी, भारतीय किसान यूनियन (असली, अराजनैतिक) के अध्यक्ष चौधरी हरपाल सिंह समेत सभी ने इसे लेकर तैयारियां तेज कर दी है। अभी 12 बजे से किसान नेताओं की राज्यवार बैठक प्रस्तावित है और दो बजे से राष्ट्रीय स्तर तक की बैठक होगी। इस बैठक में हरियाणा, पंजाब, पश्चिीमी उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों के किसान नेता अगली रणनीति पर चर्चा करेंगे, और निर्णय लेंगे। किसान नेता हरमीत सिंह कादियान का भी कहना है कि केंद्र सरकार का शुरू से ही रवैया किसान विरोधी रहा है। इसलिए केन्द्र सरकार ने खुद भरोसे लायक कोई जमीन नहीं छोड़ी है।

क्या है केन्द्र सरकार की मंशा?

किसान नेता चौधरी हरपाल सिंह का कहना है कि केंद्र सरकार दिल्ली की सीमा पर डटे और देश के दूसरे हिस्सों से कूच कर चुके लाखों किसानों को किसी तरह से एक बार उनके खलिहान की तरफ भेजने की रणनीति पर काम कर रही है। चौधरी हरपाल सिंह का कहना है कि केंद्र सरकार की नियत साफ नहीं है। वह तो शुरू से आंदोलन को बदनाम कर रही है। दिल्ली की सीमाओं पर आंदोलनरत हमारे 125 किसान शहीद हो गए और केंद्र सरकार, उनके मंत्रियों के मुंह से श्रद्धांजलि के शब्द तक नहीं निकले।

अभी तक केन्द्र सरकार कह रही थी कि वह तीनों कानूनों को रद्द नहीं करेगी, बरगलाने के लिए एमएसपी पर खरीद का जुमला छोड़ रही थी, कृषि मंत्री कह रहे थे कि वह एक दिन के लिए भी तीनों कानूनों को निलंबित नहीं रख सकते। फिर अचानक कैसे डेढ़ साल के लिए निलंबित रखने के लिए तैयार हो रहे हैं? इससे तो अच्छा है कि सरकार जिद छोड़े, कानूनों को रद्द करे और नए सिरे से कानून लाने के लिए मिलकर होमवर्क करे। हरपाल सिंह का कहना है कि किसान संगठन केन्द्र सरकार की हर नियत को भांपने, समझने में सक्षम हैं।

हमारी दो प्रमुख मांगें अभी भी हैं

हरमीत सिंह कादियान और चौधरी हरपाल सिंह का कहना है कि किसान एमएसपी पर खरीद की गारंटी और तीनों काले कानूनों को वापस लेने की मांग के साथ दिल्ली की सीमा पर आ डटे हैं। उनकी दोनों मांगें अभी भी बनी हुई हैं। सरकार ने इस पर कोई फैसला नहीं लिया है। केन्द्र सरकार ने इससे पहले भी कहा था कि वह स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें लागू करेगी, लेकिन कहां लागू किया? हरपाल सिंह कहते हैं कि यह कोई बाबा रामदेव का आंदोलन नहीं है, जिसे केन्द्र सरकार डंडे के बल पर भगा देगी। हम किसान हैं, शांतिपूर्ण तरीके से अपना प्रदर्शन कर रहे हैं। लाखों की संख्या में हैं, सौ से अधिक किसान प्रदर्शन करते हुए शहीद हो गए, लेकिन किसी को एक खरोंच भी नहीं आई। हम इसी शिद्दत से अपनी मांग को लेकर डटे रहेंगे।

पुलिस की धौंस से डरने वाले नहीं, निकलेगी ट्रैक्टर परेड

गुरनाम सिंह चढ़ूनी पंजाब के किसान नेताओं के साथ बैठक में व्यस्त थे। लिहाजा बात नहीं हो पाई। किसान नेता हनन मुल्ला को भी सरकार के प्रस्ताव पर भरोसा नहीं है। पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश से हजारों किसानों ने ट्रैक्टरों के साथ दिल्ली की तरफ कूच करना शुरू कर दिया है। देश की खुफिया एजेंसी भी काफी सतर्कता बरत रही है। पंजाब से ही 10-15 हजार ट्रैक्टरों के रवाना होने की सूचना आ रही है।

ट्रैक्टर मार्च के बारे में पंजाब के किसान नेताओं का कहना है कि इसे हम गणतंत्र दिवस के दिन करेंगे। चौधरी हरपाल सिंह भी कहते हैं कि केन्द्र सरकार हमें पुलिस की धौंस न दिखाए। ट्रैक्टर मार्च होकर रहेगा। रहा सवाल हिंसा और सुरक्षा का तो 56 दिन के आंदोलन में किसानों ने न केवल अपना धैर्य, संयम दिखाया है, बल्कि पूरी तरह से शांतिपूर्ण आंदोलन कर रहे हैं। हमने किसी को भी कोई शारीरिक क्षति नहीं पहुंचाई है। चौधरी हरपाल सिंह का कहना है कि हमारे बेटे ही देश की सीमाओं की सुरक्षा करते हैं। वह पुलिस, अर्ध सैनिकबल और सेना में हैं। हम देश की सुरक्षा का सही अर्थ भी समझते हैं।

किसानों के सामने भी है एक चुनौती

किसान इसे अपने लिए बड़ी चुनौती मान रहे हैं। किसान संगठन से जुड़े एक बड़े नेता का कहना है कि पंजाब से चलकर दिल्ली आने में कितने पापड़ बेलने पड़े, कितनी बार पानी की बौछारें और  हरियाणा सरकार के जुल्म सहने पड़े, हम जानते हैं। लाखों की संख्या में किसानों के साथ सिंघु, टिकरी, गाजीपुर बार्डर पर आना, 56 दिन कड़ाके की ठंड, बारिश, शीत लहर को झेलना, संसाधन खड़ा करना आसान नहीं है। इसलिए एक बार जब किसान बिना मांग पूरी हुए खलिहान की तरफ लौट गया, तो अगले दस साल तक अपनी मांगों को लेकर इतना बड़ा आंदोलन करने की जहमत नहीं उठाई जा सकेगी।

होशियारपुर, मोंगा और गुरुदासपुर से आए युवा किसान की टोली का भी यही मानना है। बीटेक, एमबीए और बीबीए कर चुके युवा अपने चाचा, ताऊ, दादा के साथ आंदोलन में शामिल हैं। उनका कहना है कि सरकार तीनों कानून में संशोधन करने को तैयार है, डेढ़ साल के लिए इन्हें निलंबित करने के लिए तैयार है तो आखिर रद्द नहीं करने की जिद क्यों पकड़कर बैठ गई है।

सार

  • रेलमंत्री ने कहा रेलवे का निजीकरण नहीं करेंगे और करना शुरू कर दिया तो भरोसा कैसे करें
  • सरकार की मंशा ठीक नहीं, इरादा किसानों को उनके खलिहानों तक वापस भेजना है
  • तीन कृषि कानून रद्द होने, एमएसपी की गारंटी मिलने तक जारी रहेगा आंदोलन
  • डेढ़ साल तक कानूनों को निलंबित रखने से अच्छा है कि उन्हें वापस ले सरकार

विस्तार

केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने अगले डेढ़ साल तक तीनों कृषि कानूनों को निलंबित रखने का प्रस्ताव जरूर दिया है, लेकिन किसान संगठन केन्द्र सरकार पर ऐतबार नहीं कर पा रहे हैं। किसान संगठन आज दो बंजे सिंघु बॉर्डर पर मैराथन बैठक कर आंदोलन के भविष्य, सरकार के प्रस्ताव और अपनी मांगों पर एकजुटता बनाने की रणनीति पर निर्णय लेंगे। फिलहाल किसानों की मंशा केन्द्र सरकार के मीठे जाल में फंसने की नहीं है। उनका कहना है कि सरकार की मंशा ठीक नहीं है। वह कभी हमें राष्ट्र विरोधी, कभी खालिस्तानी और कभी कुछ बताती है। कभी हमारे आंदोलन को बड़े किसानों का आंदोलन बताती है। इसलिए इस बार हम अंतिम निर्णय लेकर ही जाएंगे।

किसान नेता गुरनाम सिंह चढ़ूनी, भारतीय किसान यूनियन (असली, अराजनैतिक) के अध्यक्ष चौधरी हरपाल सिंह समेत सभी ने इसे लेकर तैयारियां तेज कर दी है। अभी 12 बजे से किसान नेताओं की राज्यवार बैठक प्रस्तावित है और दो बजे से राष्ट्रीय स्तर तक की बैठक होगी। इस बैठक में हरियाणा, पंजाब, पश्चिीमी उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों के किसान नेता अगली रणनीति पर चर्चा करेंगे, और निर्णय लेंगे। किसान नेता हरमीत सिंह कादियान का भी कहना है कि केंद्र सरकार का शुरू से ही रवैया किसान विरोधी रहा है। इसलिए केन्द्र सरकार ने खुद भरोसे लायक कोई जमीन नहीं छोड़ी है।

क्या है केन्द्र सरकार की मंशा?

किसान नेता चौधरी हरपाल सिंह का कहना है कि केंद्र सरकार दिल्ली की सीमा पर डटे और देश के दूसरे हिस्सों से कूच कर चुके लाखों किसानों को किसी तरह से एक बार उनके खलिहान की तरफ भेजने की रणनीति पर काम कर रही है। चौधरी हरपाल सिंह का कहना है कि केंद्र सरकार की नियत साफ नहीं है। वह तो शुरू से आंदोलन को बदनाम कर रही है। दिल्ली की सीमाओं पर आंदोलनरत हमारे 125 किसान शहीद हो गए और केंद्र सरकार, उनके मंत्रियों के मुंह से श्रद्धांजलि के शब्द तक नहीं निकले।

अभी तक केन्द्र सरकार कह रही थी कि वह तीनों कानूनों को रद्द नहीं करेगी, बरगलाने के लिए एमएसपी पर खरीद का जुमला छोड़ रही थी, कृषि मंत्री कह रहे थे कि वह एक दिन के लिए भी तीनों कानूनों को निलंबित नहीं रख सकते। फिर अचानक कैसे डेढ़ साल के लिए निलंबित रखने के लिए तैयार हो रहे हैं? इससे तो अच्छा है कि सरकार जिद छोड़े, कानूनों को रद्द करे और नए सिरे से कानून लाने के लिए मिलकर होमवर्क करे। हरपाल सिंह का कहना है कि किसान संगठन केन्द्र सरकार की हर नियत को भांपने, समझने में सक्षम हैं।

हमारी दो प्रमुख मांगें अभी भी हैं

हरमीत सिंह कादियान और चौधरी हरपाल सिंह का कहना है कि किसान एमएसपी पर खरीद की गारंटी और तीनों काले कानूनों को वापस लेने की मांग के साथ दिल्ली की सीमा पर आ डटे हैं। उनकी दोनों मांगें अभी भी बनी हुई हैं। सरकार ने इस पर कोई फैसला नहीं लिया है। केन्द्र सरकार ने इससे पहले भी कहा था कि वह स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें लागू करेगी, लेकिन कहां लागू किया? हरपाल सिंह कहते हैं कि यह कोई बाबा रामदेव का आंदोलन नहीं है, जिसे केन्द्र सरकार डंडे के बल पर भगा देगी। हम किसान हैं, शांतिपूर्ण तरीके से अपना प्रदर्शन कर रहे हैं। लाखों की संख्या में हैं, सौ से अधिक किसान प्रदर्शन करते हुए शहीद हो गए, लेकिन किसी को एक खरोंच भी नहीं आई। हम इसी शिद्दत से अपनी मांग को लेकर डटे रहेंगे।

पुलिस की धौंस से डरने वाले नहीं, निकलेगी ट्रैक्टर परेड

गुरनाम सिंह चढ़ूनी पंजाब के किसान नेताओं के साथ बैठक में व्यस्त थे। लिहाजा बात नहीं हो पाई। किसान नेता हनन मुल्ला को भी सरकार के प्रस्ताव पर भरोसा नहीं है। पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश से हजारों किसानों ने ट्रैक्टरों के साथ दिल्ली की तरफ कूच करना शुरू कर दिया है। देश की खुफिया एजेंसी भी काफी सतर्कता बरत रही है। पंजाब से ही 10-15 हजार ट्रैक्टरों के रवाना होने की सूचना आ रही है।

ट्रैक्टर मार्च के बारे में पंजाब के किसान नेताओं का कहना है कि इसे हम गणतंत्र दिवस के दिन करेंगे। चौधरी हरपाल सिंह भी कहते हैं कि केन्द्र सरकार हमें पुलिस की धौंस न दिखाए। ट्रैक्टर मार्च होकर रहेगा। रहा सवाल हिंसा और सुरक्षा का तो 56 दिन के आंदोलन में किसानों ने न केवल अपना धैर्य, संयम दिखाया है, बल्कि पूरी तरह से शांतिपूर्ण आंदोलन कर रहे हैं। हमने किसी को भी कोई शारीरिक क्षति नहीं पहुंचाई है। चौधरी हरपाल सिंह का कहना है कि हमारे बेटे ही देश की सीमाओं की सुरक्षा करते हैं। वह पुलिस, अर्ध सैनिकबल और सेना में हैं। हम देश की सुरक्षा का सही अर्थ भी समझते हैं।

किसानों के सामने भी है एक चुनौती

किसान इसे अपने लिए बड़ी चुनौती मान रहे हैं। किसान संगठन से जुड़े एक बड़े नेता का कहना है कि पंजाब से चलकर दिल्ली आने में कितने पापड़ बेलने पड़े, कितनी बार पानी की बौछारें और  हरियाणा सरकार के जुल्म सहने पड़े, हम जानते हैं। लाखों की संख्या में किसानों के साथ सिंघु, टिकरी, गाजीपुर बार्डर पर आना, 56 दिन कड़ाके की ठंड, बारिश, शीत लहर को झेलना, संसाधन खड़ा करना आसान नहीं है। इसलिए एक बार जब किसान बिना मांग पूरी हुए खलिहान की तरफ लौट गया, तो अगले दस साल तक अपनी मांगों को लेकर इतना बड़ा आंदोलन करने की जहमत नहीं उठाई जा सकेगी।

होशियारपुर, मोंगा और गुरुदासपुर से आए युवा किसान की टोली का भी यही मानना है। बीटेक, एमबीए और बीबीए कर चुके युवा अपने चाचा, ताऊ, दादा के साथ आंदोलन में शामिल हैं। उनका कहना है कि सरकार तीनों कानून में संशोधन करने को तैयार है, डेढ़ साल के लिए इन्हें निलंबित करने के लिए तैयार है तो आखिर रद्द नहीं करने की जिद क्यों पकड़कर बैठ गई है।

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