Breaking News

किसान आंदोलन: सिर्फ एमएसपी की गारंटी से दूर नहीं होगा किसानों का दर्द

पढ़ें अमर उजाला ई-पेपर
कहीं भी, कभी भी।

*Yearly subscription for just ₹299 Limited Period Offer. HURRY UP!

ख़बर सुनें

आंदोलन कर रहे किसानों की सबसे प्रमुख मांग है न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी की गारंटी। हालांकि जानकारों का कहना है कि मात्र इसी से किसानों का दर्द दूर नहीं होगा। एमएसपी के अलावा सार्वजनिक संग्रह प्रणाली, पब्लिक प्रोक्योरमेंट सिस्टम (पीपीएस) और कृषि उत्पादों की समय से खरीद भी जरूरी है। 

अगर इनमें से किसी एक को भी अलग कर दिया जाए तो पूरे ढांचे का कोई मतलब नहीं रह जाएगा। यानी एमएसपी, मंडियां और पीपीएस तीनों होगी तभी लाभ मिलेगा।

70 के दशक में एमएसपी और सार्वजनिक संग्रह प्रणाली पीपीएस सबसे अधिक फायदा धान, गेहूं पैदा करने वाले किसानों को मिला। आज के दौर में एमएसपी और पीपीएस का उद्देश्य दोहरा है। पहला फसलों में रोग जलवायु परिवर्तन और सूखे से उपजी परिस्थितियों में खाद्यान्न आत्मनिर्भरता।

दूसरा किसानों की एक आय सुनिश्चित करना। दूसरा उद्देश्य पूरा करना इसीलिए भी चुनौतीपूर्ण है क्योंकि 86 प्रतिशत किसान परिवार या तो मार्जिनल (1 हेक्टेयर से कम जोत वाले) या छोटी जोत (एक से 2 हेक्टेयर जोत वाले) हैं जिनका अपने कृषि उत्पाद तुरंत बेचना मजबूरी होती है।

क्या है एमएसपी?
अगर कभी कई फसलों की कीमत बाजार के हिसाब से गिर भी जाती है। तब भी केंद्र सरकार तथा तय न्यूनतम समर्थन मूल्य पर ही किसानों से फसल खरीदती है ताकि किसानों को नुकसान से बचाया जा सके। किसी फसल की एमएसपी पूरे देश में एक ही होती है। कृषि मंत्रालय के अधीन कृषि लागत और मूल्य आयोग (सीएसीपी) की अनुशंसा के आधार पर एमएसपी तय होता है।

एमएसपी का हर फसल को क्यों नहीं मिलता लाभ?
सरकार 23 फसलों के लिए एमएसपी घोषित करती है। लेकिन इस पर मुख्यत दो ही फसलों की होती है। जैसे मक्के का भाव 2019-2020 में 1760 रुपए प्रति क्विंटल था। बिहार में किसानों को बाजार में औसत मूल्य 1250 रुपये प्रति क्विंंटल का मिला। हरियाणा में 1000 से 1200 रुपये प्रति क्विंंटल ही मिला।

मंडियों का जाल बिछाना होगा
अनाज संग्रह करने के लिए दो चीजें जरूरी हैं। पहला मंडियों का जाल, जैसे पंजाब में हर 20 किलोमीटर पर एक मंडी है अभी 7000 एपीएमसी मंडिया हैं। अगर हर 5 किलोमीटर पर मंडी बनानी होगी तो 40000 मंडियों की जरूरत होगी। दूसरा एमएसपी को 23 फसलों के लिए कानूनी बाध्य बनाना है। पूरे देश में कोई गुंजाइश ही नहीं होगी कि कोई व्यापारी उसके नीचे खरीद कर सके।  – देवेंद्र शर्मा, कृषि विशेषज्ञ

ऐसे तय होता है एमएसपी?
एमएसपी का आकलन करने के लिए कृषि लागत एवं मूल्य आयोग खेती की लागत को तीन भागों में बांटता है।

  • ए2, ए2 + एफ एल और सी2। अभी फसल की लागत पर जो एमएसपी तय किया जा रहा है वह ए2+ एफएल है।
  • ए2+ एफएल: उत्पादन के लिए किसानों द्वारा किए गए सभी तरह के नकदी खर्च जैसे बीज, खाद ईंधन और सिंचाई आदि की लागत शामिल होती है।
  • नकद खर्च के साथ पारिवारिक श्रम यानी फसल उत्पादन लागत में किसान परिवार का अनुमानित मेहनताना भी जोड़ा जाता है।
  • सी2: खेतों के व्यवसायिक मॉडल को अपनाया जाता है। इसमें कुल नगद लागत और किसान के पारिवारिक पारिश्रमिक के अलावा खेत की जमीन का किराया और कुल कृषि पूंजी पर लगने वाला ब्याज भी शामिल किया जाता है। 

 

आंदोलन कर रहे किसानों की सबसे प्रमुख मांग है न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी की गारंटी। हालांकि जानकारों का कहना है कि मात्र इसी से किसानों का दर्द दूर नहीं होगा। एमएसपी के अलावा सार्वजनिक संग्रह प्रणाली, पब्लिक प्रोक्योरमेंट सिस्टम (पीपीएस) और कृषि उत्पादों की समय से खरीद भी जरूरी है। 

अगर इनमें से किसी एक को भी अलग कर दिया जाए तो पूरे ढांचे का कोई मतलब नहीं रह जाएगा। यानी एमएसपी, मंडियां और पीपीएस तीनों होगी तभी लाभ मिलेगा।

70 के दशक में एमएसपी और सार्वजनिक संग्रह प्रणाली पीपीएस सबसे अधिक फायदा धान, गेहूं पैदा करने वाले किसानों को मिला। आज के दौर में एमएसपी और पीपीएस का उद्देश्य दोहरा है। पहला फसलों में रोग जलवायु परिवर्तन और सूखे से उपजी परिस्थितियों में खाद्यान्न आत्मनिर्भरता।

दूसरा किसानों की एक आय सुनिश्चित करना। दूसरा उद्देश्य पूरा करना इसीलिए भी चुनौतीपूर्ण है क्योंकि 86 प्रतिशत किसान परिवार या तो मार्जिनल (1 हेक्टेयर से कम जोत वाले) या छोटी जोत (एक से 2 हेक्टेयर जोत वाले) हैं जिनका अपने कृषि उत्पाद तुरंत बेचना मजबूरी होती है।

क्या है एमएसपी?

अगर कभी कई फसलों की कीमत बाजार के हिसाब से गिर भी जाती है। तब भी केंद्र सरकार तथा तय न्यूनतम समर्थन मूल्य पर ही किसानों से फसल खरीदती है ताकि किसानों को नुकसान से बचाया जा सके। किसी फसल की एमएसपी पूरे देश में एक ही होती है। कृषि मंत्रालय के अधीन कृषि लागत और मूल्य आयोग (सीएसीपी) की अनुशंसा के आधार पर एमएसपी तय होता है।

एमएसपी का हर फसल को क्यों नहीं मिलता लाभ?

सरकार 23 फसलों के लिए एमएसपी घोषित करती है। लेकिन इस पर मुख्यत दो ही फसलों की होती है। जैसे मक्के का भाव 2019-2020 में 1760 रुपए प्रति क्विंटल था। बिहार में किसानों को बाजार में औसत मूल्य 1250 रुपये प्रति क्विंंटल का मिला। हरियाणा में 1000 से 1200 रुपये प्रति क्विंंटल ही मिला।

मंडियों का जाल बिछाना होगा

अनाज संग्रह करने के लिए दो चीजें जरूरी हैं। पहला मंडियों का जाल, जैसे पंजाब में हर 20 किलोमीटर पर एक मंडी है अभी 7000 एपीएमसी मंडिया हैं। अगर हर 5 किलोमीटर पर मंडी बनानी होगी तो 40000 मंडियों की जरूरत होगी। दूसरा एमएसपी को 23 फसलों के लिए कानूनी बाध्य बनाना है। पूरे देश में कोई गुंजाइश ही नहीं होगी कि कोई व्यापारी उसके नीचे खरीद कर सके।  – देवेंद्र शर्मा, कृषि विशेषज्ञ

ऐसे तय होता है एमएसपी?

एमएसपी का आकलन करने के लिए कृषि लागत एवं मूल्य आयोग खेती की लागत को तीन भागों में बांटता है।

  • ए2, ए2 + एफ एल और सी2। अभी फसल की लागत पर जो एमएसपी तय किया जा रहा है वह ए2+ एफएल है।
  • ए2+ एफएल: उत्पादन के लिए किसानों द्वारा किए गए सभी तरह के नकदी खर्च जैसे बीज, खाद ईंधन और सिंचाई आदि की लागत शामिल होती है।
  • नकद खर्च के साथ पारिवारिक श्रम यानी फसल उत्पादन लागत में किसान परिवार का अनुमानित मेहनताना भी जोड़ा जाता है।
  • सी2: खेतों के व्यवसायिक मॉडल को अपनाया जाता है। इसमें कुल नगद लागत और किसान के पारिवारिक पारिश्रमिक के अलावा खेत की जमीन का किराया और कुल कृषि पूंजी पर लगने वाला ब्याज भी शामिल किया जाता है। 

 


Source link

arvind007

News Media24 is a Professional News Platform. Here we will provide you National, International, Entertainment News, Gadgets updates, etc. 

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
%d bloggers like this: