National

किसान आंदोलनः …तो अब भी बन सकती है बात

प्रदर्शन करते किसान (फाइल फोटो)
– फोटो : PTI

पढ़ें अमर उजाला ई-पेपर
कहीं भी, कभी भी।

*Yearly subscription for just ₹299 Limited Period Offer. HURRY UP!

ख़बर सुनें

ख़बर सुनें

किसान आंदोलन का गतिरोध खत्म होने की उम्मीद अब भी बची है। बुधवार को सरकार की ओर से दो कदम बढ़ाने के बाद अब किसानों ने पहला कदम बढ़ा दिया है। 4 जनवरी की प्रस्तावित वार्ता के माहौल में शांतिपूर्ण डटे रहने का संकल्प दोहराया लेकिन कुंडली-मानेसर-पलवल एक्सप्रेस वे पर ट्रैक्टर-टॉला जाम समेत तमाम आक्रामक आंदोलनों से फिलहाल परहेज किया है। इसके साथ ही किसान संगठनों ने पंजाब-हरियाणा में मोबाइल टॉवर्स में तोड़फोड़ करने वालों को रोकने की अपील की है।

2 जनवरी को रणनीति बनेगी
4 जनवरी की प्रस्तावित वार्ता से पहले 2 जनवरी को संयुक्त किसान मोर्चा की बैठक में अगली रणनीति तय होगी। कृषि सुधार कानूनों को खत्म करने के बजाए किसान संगठनों से सरकार ने विकल्प मांगा है। हालांकि सरकार ने किसान संगठनों, कृषि विशेषज्ञों और सरकार के प्रतिनिधियों की कमेटी बनाने का सुझाव दिया है। इस पर आंदोलनकारी किसान सहमत नहीं हैं। इसी तरह न्यूनतम समर्थन मूल्य पर भी आंदोलनकारी किसान कानूनी गारंटी चाहते हैं, जबकि सरकार लिखित गारंटी देने को तैयार है। ऐसे में बात पिछली बार जहां खत्म हुई, वहीं आकर फिर अटक गई है।

कमेटी का कमिटमेंट
तीनों कृषि कानूनों को खत्म किए बगैर विकल्प के लिए सरकार कमेटी बनाने का प्रस्ताव दे रही है। आंदोलनकारी किसान ऐसी किसी कमेटी के पक्ष में नहीं हैं। उन्हें सरकार पर भरोसा नहीं है। सरकार इस 11 सदस्यीय कमेटी में ज्यादा यानी सात सदस्य किसान संगठनों के रखना चाहती है। कृषि विशेषज्ञ और सरकार के प्रतिनिधि दो-दो हो सकते हैं। भरोसा बटोरने के लिए जरूरत पड़ने पर इस कमेटी पर सुप्रीम कोर्ट की मुहर लग सकती है। सुप्रीम कोर्ट भी पिछली सुनवाई के दौरान ऐसी ही एक कमेटी बनाकर मसले के हल के पक्ष में है। सरकार की ओर से भरोसा दिया गया कि यह कमेटी न केवल कृषि कानूनों में खामियों को देखते हुए भविष्य में बदलावों के लिए पहल करेगी बल्कि न्यूनतम समर्थन मूल्य को भी यकीनी बनाएगी। अगली वार्ता की तारीख 4 जनवरी मुकर्रर की गई है। उसी दिन से सुप्रीम कोर्ट खुल रही है। ऐसे में मेज पर बनी बात से सुप्रीम कोर्ट को अवगत कराकर सहमति बनाई जा सकती है। इससे भरोसे का संकट खत्म हो जाएगा।

सरकार के दर्द से हमदर्दी नहीं 
बुधवार को भी वार्ता की शुरुआत कृषि कानूनों को खत्म करने की प्रक्रियाओं और न्यूनतम समर्थन मूल्य की कानूनी गारंटी से ही हुई। सरकार की ओर से कृषि मंत्री नरेंद्र तोमर ने कानूनों को खत्म करने की मुश्किलें गिनाईं। पीयूष गोयल ने एमएसपी की गारंटी को लेकर पक्ष रखा। मंत्री समूह ने इन दोनों मुद्दों पर कमेटी बनाने का सुझाव दिया। इस पर संयुक्त किसान मोर्चा की ओर से भाकियू राजेवाल के प्रांतीय अध्यक्ष बलवीर सिंह राजेवाल, क्रांतिकारी किसान यूनियन पंजाब के प्रांतीय अध्यक्ष डॉ. दर्शनपाल, जम्हुरी किसान सभा पंजाब के महासचिव कुलवंत सिंह संधु,  कुलहिंद किसान संघर्ष तालमेल कमेटी के हन्नान मोल्ला, सर्वहिंद राष्ट्रीय किसान महासंघ के शिव कुमार कक्का, भाकियू के राकेश टिकैत, भाकियू सिधुपुर के जगजीत सिंह धल्लेवाल ने एक स्वर में विरोध किया। इन किसान नेताओं ने कहा कि वे हर हाल में कानून वापसी चाहते हैं। फिर राजनाथ सिंह वाले फार्मूले की ओर सरकार ने इशारा किया और भरोसा दिया कि कानून में खामी पर आगे बदलाव किया जा सकता है। इस पर किसान नेता नहीं माने। ऐसे में सरकार ने भरोसा जीतने के लिए संयुक्त मोर्चा से ही विकल्प मांगा। इन दोनों मामलों पर अलग से एक और बैठक करने पर सहमति बनी। इसकी तारीख 4 जनवरी तय की गई।

दूसरे दौर की वार्ता में पराली और बिजली के मुद्दे पर चर्चा हुई। सरकार ने पराली कानून को सिरे से खत्म करने पर तत्काल हामी भर दी। बिजली में सिंचाई के लिए सब्सिडी जारी रखने का भरोसा दिया गया। बिजली क्षेत्र में निजी कंपनियों समेत अन्य फैसले राज्य सरकार पर छोड़ दिया। इस आश्वासन पर किसान तैयार हो गए। अब 4 जनवरी को कृषि कानूनों के रद किए बगैर विकल्प और न्यूनतम समर्थन मूल्य की कानूनी बनाम लिखित गारंटी के विकल्प पर वार्ता होगी। इस वार्ता से पहले 2 जनवरी को संयुक्त किसान मोर्चा अपनी रणनीति और वैकल्पिक उपायों पर मंथन करेगा। सरकार भी तब तक कुछ बीच का रास्ता निकालने पर विचार करेगी।

चाय से लंगर तक बदले माहौल में चर्चा 
डेडलॉक से डॉयलॉग के बीच इस बार काफी बदला-बदला माहौल रहा। सत श्री अकाल से शुरुआत हुई। किसानों ने सरकार की चाय पी। चाय पर चर्चा हुई। फिर किसानों के लंगर में तीनों मंत्री नरेंद्र तोमर, पीयूष गोयल, सोमप्रकाश पहुंचे। साथ लंगर छका। लंगर के बाद चर्चा जारी रही। इस बार यस-नो के बजाए दो कदम आप, दो कदम हम जैसा माहौल रहा। सरकार नरम पड़ी। किसान संगठनों ने भी 4 जनवरी की प्रस्तावित अगली वार्ता तक आंदोलन में नरमी बरत कर समाधान की ओर एक और कदम बढ़ाया है, सो उम्मीद जागी है कि नया साल मंगलमय हो सकता है।

सार

  • सरकार के दो कदम बढ़ाने के बाद किसान संगठनों ने भी बढ़ाया एक कदम, गतिरोध खत्म होने की आस
  • दूसरे कदम के लिए संयुक्त किसान मोर्चा की 2 जनवरी की बैठक में अगली रणनीति
  • 4 जनवरी की प्रस्तावित वार्ता से पहले दोनों तरफ से वैकल्पिक फार्मूले पर मंथन
  • अगली वार्ता के माहौल तक शांतिपूर्ण डटे रहने का संकल्प, नए साल का जश्न मिलकर मनाएंगे
  • बुधवार को वार्ता के श्रीगणेश से मंगल की जगी उम्मीद, हो सकता नव वर्ष मंगलमय

विस्तार

किसान आंदोलन का गतिरोध खत्म होने की उम्मीद अब भी बची है। बुधवार को सरकार की ओर से दो कदम बढ़ाने के बाद अब किसानों ने पहला कदम बढ़ा दिया है। 4 जनवरी की प्रस्तावित वार्ता के माहौल में शांतिपूर्ण डटे रहने का संकल्प दोहराया लेकिन कुंडली-मानेसर-पलवल एक्सप्रेस वे पर ट्रैक्टर-टॉला जाम समेत तमाम आक्रामक आंदोलनों से फिलहाल परहेज किया है। इसके साथ ही किसान संगठनों ने पंजाब-हरियाणा में मोबाइल टॉवर्स में तोड़फोड़ करने वालों को रोकने की अपील की है।

2 जनवरी को रणनीति बनेगी

4 जनवरी की प्रस्तावित वार्ता से पहले 2 जनवरी को संयुक्त किसान मोर्चा की बैठक में अगली रणनीति तय होगी। कृषि सुधार कानूनों को खत्म करने के बजाए किसान संगठनों से सरकार ने विकल्प मांगा है। हालांकि सरकार ने किसान संगठनों, कृषि विशेषज्ञों और सरकार के प्रतिनिधियों की कमेटी बनाने का सुझाव दिया है। इस पर आंदोलनकारी किसान सहमत नहीं हैं। इसी तरह न्यूनतम समर्थन मूल्य पर भी आंदोलनकारी किसान कानूनी गारंटी चाहते हैं, जबकि सरकार लिखित गारंटी देने को तैयार है। ऐसे में बात पिछली बार जहां खत्म हुई, वहीं आकर फिर अटक गई है।

कमेटी का कमिटमेंट

तीनों कृषि कानूनों को खत्म किए बगैर विकल्प के लिए सरकार कमेटी बनाने का प्रस्ताव दे रही है। आंदोलनकारी किसान ऐसी किसी कमेटी के पक्ष में नहीं हैं। उन्हें सरकार पर भरोसा नहीं है। सरकार इस 11 सदस्यीय कमेटी में ज्यादा यानी सात सदस्य किसान संगठनों के रखना चाहती है। कृषि विशेषज्ञ और सरकार के प्रतिनिधि दो-दो हो सकते हैं। भरोसा बटोरने के लिए जरूरत पड़ने पर इस कमेटी पर सुप्रीम कोर्ट की मुहर लग सकती है। सुप्रीम कोर्ट भी पिछली सुनवाई के दौरान ऐसी ही एक कमेटी बनाकर मसले के हल के पक्ष में है। सरकार की ओर से भरोसा दिया गया कि यह कमेटी न केवल कृषि कानूनों में खामियों को देखते हुए भविष्य में बदलावों के लिए पहल करेगी बल्कि न्यूनतम समर्थन मूल्य को भी यकीनी बनाएगी। अगली वार्ता की तारीख 4 जनवरी मुकर्रर की गई है। उसी दिन से सुप्रीम कोर्ट खुल रही है। ऐसे में मेज पर बनी बात से सुप्रीम कोर्ट को अवगत कराकर सहमति बनाई जा सकती है। इससे भरोसे का संकट खत्म हो जाएगा।

सरकार के दर्द से हमदर्दी नहीं 

बुधवार को भी वार्ता की शुरुआत कृषि कानूनों को खत्म करने की प्रक्रियाओं और न्यूनतम समर्थन मूल्य की कानूनी गारंटी से ही हुई। सरकार की ओर से कृषि मंत्री नरेंद्र तोमर ने कानूनों को खत्म करने की मुश्किलें गिनाईं। पीयूष गोयल ने एमएसपी की गारंटी को लेकर पक्ष रखा। मंत्री समूह ने इन दोनों मुद्दों पर कमेटी बनाने का सुझाव दिया। इस पर संयुक्त किसान मोर्चा की ओर से भाकियू राजेवाल के प्रांतीय अध्यक्ष बलवीर सिंह राजेवाल, क्रांतिकारी किसान यूनियन पंजाब के प्रांतीय अध्यक्ष डॉ. दर्शनपाल, जम्हुरी किसान सभा पंजाब के महासचिव कुलवंत सिंह संधु,  कुलहिंद किसान संघर्ष तालमेल कमेटी के हन्नान मोल्ला, सर्वहिंद राष्ट्रीय किसान महासंघ के शिव कुमार कक्का, भाकियू के राकेश टिकैत, भाकियू सिधुपुर के जगजीत सिंह धल्लेवाल ने एक स्वर में विरोध किया। इन किसान नेताओं ने कहा कि वे हर हाल में कानून वापसी चाहते हैं। फिर राजनाथ सिंह वाले फार्मूले की ओर सरकार ने इशारा किया और भरोसा दिया कि कानून में खामी पर आगे बदलाव किया जा सकता है। इस पर किसान नेता नहीं माने। ऐसे में सरकार ने भरोसा जीतने के लिए संयुक्त मोर्चा से ही विकल्प मांगा। इन दोनों मामलों पर अलग से एक और बैठक करने पर सहमति बनी। इसकी तारीख 4 जनवरी तय की गई।


आगे पढ़ें

बीच का रस्ता


Source link

arvind007

News Media24 is a Professional News Platform. Here we will provide you National, International, Entertainment News, Gadgets updates, etc. 

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
%d bloggers like this: