Punjab

आत्महत्या के मामलों से युवा किसानों में बढ़ रहा है तनाव, रोज दस किसान ले रहे हैं मनोचिकित्सक का सहारा

राहुल संपाल, अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Thu, 21 Jan 2021 05:51 PM IST

सिंघु बॉर्डर का दृश्य
– फोटो : पीटीआई (फाइल)

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नए कृषि कानूनों के खिलाफ दिल्ली की सीमाओं पर किसानों का आंदोलन दो महीने से जारी है। इस दौरान अब तक कई किसानों की मौत हो चुकी है। कुछ किसानों की ठंड के कारण मौत हुई तो कुछ ने खुदकुशी कर ली। सिंघु बॉर्डर पर बढ़ते आत्महत्या के मामले से किसान चिंतित नजर आ रहे हैं। आंदोलन के लंबा चलने और केंद्र सरकार द्वारा मांगें नहीं माने जाने के कारण अब किसानों की मनोस्थिति पर भी प्रभाव पड़ने लगा है। ऐसे में रोज करीब दस से बारह किसान बॉर्डर पर मनोचिकित्सकों का सहारा ले रहे हैं। हफ्ते में चार दिन मनोचिकित्सक किसानों का इलाज कर रहे हैं। गंभीर रुप से बीमार किसानों को घर भी भेजा जा रहा है।

अब तक 300 किसान ले चुके हैं डॉक्टरों का सहारा

सिंघु बॉर्डर पर बढ़ते आत्महत्या के मामलों को देखते हुए यूनाइटेड सिख संगठन ने किसानों के लिए कैंप लगाया है। कैंप में साइकेट्रिस्ट  सप्ताह में चार दिन किसानों से मिलते हैं। डॉक्टर हरजीवन सिंह ने अमर उजाला को बताया कि आत्महत्या के बढ़ते मामले और लंबे चलते आंदोलन से किसानों की मनोस्थिति पर दुष्प्रभाव देखने को मिल रहा है। किसान परेशान न हों और वे अपनी परेशानी डॉक्टरों से साझा कर सकें इसलिए हमने यहा कैंप लगाया है।

हमने इस कैंप में आने को लेकर किसानों के बीच पर्चे भी बंटवाए हैं। जिसे लेकर वे हमारे पास आ रहे हैं। रोज करीब 10 से 12 किसान कैंप में पहुंचकर डॉक्टरों से अपनी बिगड़ती मनोस्थिति को लेकर चर्चा कर रहे हैं। 25 दिनों में 300 से ज्यादा किसान डॉक्टरों से राय ले चुके हैं। ज्यादा हालत खराब होने के कारण 10 से ज्यादा किसानों को उनके घर भी पहुंचा दिया गया है।  

युवा किसानों में दिख रहा है तनाव

यूनाइटेड सिख संगठन से जुड़े राजेंद्र सिंह ने अमर उजाला को बताया कि, जैसे ही किसान हमारे पास आते हैं तो डॉक्टरों की टीम उनकी मनोस्थिति और उनके स्ट्रेस लेवल को लेकर चर्चा करती है। 35 से 45 आयु वर्ग के किसानों में घर से दूर रहने और कमाने-खाने को लेकर स्ट्रेस लेवल बढता हुआ दिखाई दे रहा है। वहीं अधिकांश किसानों के मन मे डर है कि हम दो माह से आंदोलन कर रहे हैं हमारी बातें सरकार सुनेगी भी या नहीं। आंदोलन का मकसद पूरा नहीं होने के कारण उनमें हीन भावना तक देखने को मिल रही है।

उन्होंने आगे बताया कि अधिकांश किसानों ने प्रतिज्ञा ले रखी है कि हम कानून वापस करवा कर ही घर जाएंगे। ऐसे में उनके मन पर विपरीत प्रभाव भी देखने को मिल रहे हैं कि सरकार तो मान नहीं रही है अब हम कब तक घर से दूर रहेंगे। किसानों की समस्याओं को देखते हुए डॉक्टर उन्हें योग के साथ-साथ कुछ दिन के लिए घर जाने की सलाह भी दे रहे हैं। कम स्ट्रेस लेवल वाले किसानों की काउंसलिंग की जाती है। वहीं जिन किसानों की मनोस्थिति ज्यादा खराब हो रही है उन्हें सीधे जाने की सलाह दी जाती है, ताकि वे कोई गलत कदम न उठा लें।

गौरतलब है कि नए कृषि कानूनों को रद्द करने की मांग को लेकर किसान अड़े हुए हैं। वहीं किसान और सरकार के बीच गतिरोध भी बरकरार है। सुप्रीम कोर्ट के कमेटी वाले फैसले पर भी किसान संगठन संतुष्ट नजर नहीं आ रहे हैं। बुधवार को सरकार ने किसान संगठनों के सामने प्रस्ताव रखा कि वे डेढ़ साल कृषि कानूनों को लागू नहीं करेगी।

 

सार

35 से 45 आयु वर्ग के किसानों में घर से दूर रहने और कमाने-खाने को लेकर स्ट्रेस लेवल बढता हुआ दिखाई दे रहा है। वहीं अधिकांश किसानों के मन मे डर है कि हम दो माह से आंदोलन कर रहे हैं हमारी बातें सरकार सुनेगी भी या नहीं…

विस्तार

नए कृषि कानूनों के खिलाफ दिल्ली की सीमाओं पर किसानों का आंदोलन दो महीने से जारी है। इस दौरान अब तक कई किसानों की मौत हो चुकी है। कुछ किसानों की ठंड के कारण मौत हुई तो कुछ ने खुदकुशी कर ली। सिंघु बॉर्डर पर बढ़ते आत्महत्या के मामले से किसान चिंतित नजर आ रहे हैं। आंदोलन के लंबा चलने और केंद्र सरकार द्वारा मांगें नहीं माने जाने के कारण अब किसानों की मनोस्थिति पर भी प्रभाव पड़ने लगा है। ऐसे में रोज करीब दस से बारह किसान बॉर्डर पर मनोचिकित्सकों का सहारा ले रहे हैं। हफ्ते में चार दिन मनोचिकित्सक किसानों का इलाज कर रहे हैं। गंभीर रुप से बीमार किसानों को घर भी भेजा जा रहा है।

अब तक 300 किसान ले चुके हैं डॉक्टरों का सहारा

सिंघु बॉर्डर पर बढ़ते आत्महत्या के मामलों को देखते हुए यूनाइटेड सिख संगठन ने किसानों के लिए कैंप लगाया है। कैंप में साइकेट्रिस्ट  सप्ताह में चार दिन किसानों से मिलते हैं। डॉक्टर हरजीवन सिंह ने अमर उजाला को बताया कि आत्महत्या के बढ़ते मामले और लंबे चलते आंदोलन से किसानों की मनोस्थिति पर दुष्प्रभाव देखने को मिल रहा है। किसान परेशान न हों और वे अपनी परेशानी डॉक्टरों से साझा कर सकें इसलिए हमने यहा कैंप लगाया है।

हमने इस कैंप में आने को लेकर किसानों के बीच पर्चे भी बंटवाए हैं। जिसे लेकर वे हमारे पास आ रहे हैं। रोज करीब 10 से 12 किसान कैंप में पहुंचकर डॉक्टरों से अपनी बिगड़ती मनोस्थिति को लेकर चर्चा कर रहे हैं। 25 दिनों में 300 से ज्यादा किसान डॉक्टरों से राय ले चुके हैं। ज्यादा हालत खराब होने के कारण 10 से ज्यादा किसानों को उनके घर भी पहुंचा दिया गया है।  

युवा किसानों में दिख रहा है तनाव

यूनाइटेड सिख संगठन से जुड़े राजेंद्र सिंह ने अमर उजाला को बताया कि, जैसे ही किसान हमारे पास आते हैं तो डॉक्टरों की टीम उनकी मनोस्थिति और उनके स्ट्रेस लेवल को लेकर चर्चा करती है। 35 से 45 आयु वर्ग के किसानों में घर से दूर रहने और कमाने-खाने को लेकर स्ट्रेस लेवल बढता हुआ दिखाई दे रहा है। वहीं अधिकांश किसानों के मन मे डर है कि हम दो माह से आंदोलन कर रहे हैं हमारी बातें सरकार सुनेगी भी या नहीं। आंदोलन का मकसद पूरा नहीं होने के कारण उनमें हीन भावना तक देखने को मिल रही है।

उन्होंने आगे बताया कि अधिकांश किसानों ने प्रतिज्ञा ले रखी है कि हम कानून वापस करवा कर ही घर जाएंगे। ऐसे में उनके मन पर विपरीत प्रभाव भी देखने को मिल रहे हैं कि सरकार तो मान नहीं रही है अब हम कब तक घर से दूर रहेंगे। किसानों की समस्याओं को देखते हुए डॉक्टर उन्हें योग के साथ-साथ कुछ दिन के लिए घर जाने की सलाह भी दे रहे हैं। कम स्ट्रेस लेवल वाले किसानों की काउंसलिंग की जाती है। वहीं जिन किसानों की मनोस्थिति ज्यादा खराब हो रही है उन्हें सीधे जाने की सलाह दी जाती है, ताकि वे कोई गलत कदम न उठा लें।

गौरतलब है कि नए कृषि कानूनों को रद्द करने की मांग को लेकर किसान अड़े हुए हैं। वहीं किसान और सरकार के बीच गतिरोध भी बरकरार है। सुप्रीम कोर्ट के कमेटी वाले फैसले पर भी किसान संगठन संतुष्ट नजर नहीं आ रहे हैं। बुधवार को सरकार ने किसान संगठनों के सामने प्रस्ताव रखा कि वे डेढ़ साल कृषि कानूनों को लागू नहीं करेगी।

 

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