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अर्जेंटीना में महिलाओं को राहत, सरकार ने गर्भपात के मुकदमों को लिया वापस

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अर्जेंटीना सरकार ने गर्भपात को अपराध की श्रेणी से हटाने के फैसले पर अमल शुरू कर दिया है। उसने उन तमाम महिलाओं पर चल रहे मुकदमों को वापस लेने का फैसला किया है, जिन्होंने गर्भपात कराया था। कुछ समय पहले अर्जेंटीना की संसद ने गर्भपात की प्रक्रियाओं को कानूनी रूप देने का एतिहासिक बिल पास किया था। अर्जेंटीना एक कट्टरपंथी कैथोलिक देश रहा है। लेकिन वामपंथी नेता अल्बर्तो फर्नांडेज के राष्ट्रपति बनने के बाद देश में कई प्रगतिशील कदम उठाए गए हैं।

मुकदमे वापस लेने के ताजा फैसले से हजारों महिलाओं को राहत मिलेगी, जिनमें ज्यादातर गरीब और निम्न मध्य वर्ग की हैं। लेकिन महिला अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि अभी भी न्याय व्यवस्था के भीतर लिंग-भेदी भावनाएं गहराई तक पैठी हुई हैं, इसलिए महिलाओं के प्रजनन अधिकार की लड़ाई अभी मंजिल पर नहीं पहुंची है।

अर्जेंटीना में नया कानून 30 दिसंबर को पास हुआ था। इसके तहत गर्भावस्था के पहले 14 हफ्तों के दौरान गर्भपात कराने की इजाजत दी गई है। इस कानून के पारित होने के साथ ही अर्जेंटीना लैटिन अमेरिका में ऐसा प्रगतिशील कदम उठाने वाला पहला देश बन गया। इस कानून के पक्ष में माहौल बनाने के लिए महिला अधिकार कार्यकर्ता वर्षों से अभियान चला रही थीं।

पहले के कानून के तहत गर्भपात कराना जुर्म था, जिसके लिए कैद का प्रावधान था। इसके कारण महिलाओं को ज्यादती और हिंसा का सामना करना पड़ता था। तीन साल पहले एक ऐसा मामला सामने आया था, जिसमें एक महिला का स्वतः गर्भपात (मिसकैरिज) होने पर उसे तीन साल के लिए जेल भेज दिया गया। कोर्ट ने भी उस महिला की यह दलील नहीं सुनी कि उसे उस बात की सजा दी जा रही है, जिसमें उसका कोई हाथ नहीं है।

गर्भपात कराने वाली महिलाओं के साथ अर्जेंटीना का समाज अपमानजनक और कभी-कभी क्रूर व्यवहार भी करता रहा है। महिला अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि समाज का नजरिया बदलने में अभी वक्त लगेगा। लेकिन फिलहाल कानूनी राहत उनकी एक बड़ी जीत है। अभी ये साफ नहीं हुआ है कि मुकदमा उठाने के फैसले से कुल कितनी महिलाओं को फायदा होगा।

लेकिन कुछ समय पहले जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक पिछले आठ साल में 1,532 ऐसे मामले दर्ज हुए थे। ये रिपोर्ट मानव अधिकार संस्था- सेल्स, अबॉर्शन राइट्स कैंपनेर्स और सैन मार्टिन यूनिवर्सिटी सेंटर ने मिलकर तैयार की थी। लेकिन ये रिपोर्ट तैयार करने वाले कार्यकर्ताओं ने बताया था कि देश के कई राज्यों ने उनकी मांगी जानकारी उन्हें नहीं दी। इसलिए ये संख्या कहीं ज्यादा होने का अनुमान है।

अर्जेंटीना की महिला, लिंग और विविधता मामलों की मंत्री एलिजाबेथ गोमेज अल्कोर्ता ने ब्रिटिश अखबार द गार्जियन को बताया कि जिस किसी भी महिला पर गर्भपात के आरोप में मुकदमा चल रहा है, उन सबको इस फैसले का लाभ मिलेगा। इसकी वजह यह है कि संसद से पारित हुआ कानून अतीत की तारीख से लागू किया गया है। इस बीच महिला अधिकार कार्यकर्ताओँ ने मांग की है कि अब उन सभी मामलों की जांच कराई जानी चाहिए, जिनमें गर्भपात कराने के कारण किसी महिला की हत्या कर दिए जाने का आरोप लगा था।

उन महिलाओं को भी राहत देन की मांग की गई है, जिन्हें मृत बच्चे का जन्म देने (स्टिल बर्थ) या मिसकैरिज के कारण हत्या का दोषी ठहराया गया और जो इस कारण अभी भी जेल में हैं। अकसर ऐसे मामलों की शिकार गरीब घरों की महिलाएं बनी हैं। साथ ही गर्भपात की अवधि 14 हफ्तों से बढ़ाने की मांग की जा रही है। बहुत से देशों में 20 हफ्तों तक गर्भपात कराने की इजाजत मिली हुई है। इस मामले अर्जेंटीना की जेल मंत्री मारिया लाउरा गैरिगोस ने कहा कि यह मामला इस परिभाषा पर निर्भर करता है कि भ्रूण कब भ्रूण से आगे बढ़ जाता है। उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों में ज्यादातर कानून पुरुष बनाते हैं और जज भी पुरुष होते हैं। जबकि मुद्दा यह है कि महिलाएं अपने शरीर का क्या करें, यह फैसला करना उनका अधिकार होना चाहिए।

बेशक अभी भी अर्जंटीना में महिला अधिकार की लड़ाई अपनी मंजिल तक नहीं पहुंची है। लेकिन ताजा कानून और उसको लेकर चल रही बहस का संकेत है कि देश सही दिशा में है। अर्जेंटीना जैसे रूढ़िवादी देश के लिए इसे एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।

सार

अर्जेंटीना में नया कानून 30 दिसंबर को पास हुआ था। इसके तहत गर्भावस्था के पहले 14 हफ्तों के दौरान गर्भपात कराने की इजाजत दी गई है। इस कानून के पारित होने के साथ ही अर्जेंटीना लैटिन अमेरिका में ऐसा प्रगतिशील कदम उठाने वाला पहला देश बन गया…

विस्तार

अर्जेंटीना सरकार ने गर्भपात को अपराध की श्रेणी से हटाने के फैसले पर अमल शुरू कर दिया है। उसने उन तमाम महिलाओं पर चल रहे मुकदमों को वापस लेने का फैसला किया है, जिन्होंने गर्भपात कराया था। कुछ समय पहले अर्जेंटीना की संसद ने गर्भपात की प्रक्रियाओं को कानूनी रूप देने का एतिहासिक बिल पास किया था। अर्जेंटीना एक कट्टरपंथी कैथोलिक देश रहा है। लेकिन वामपंथी नेता अल्बर्तो फर्नांडेज के राष्ट्रपति बनने के बाद देश में कई प्रगतिशील कदम उठाए गए हैं।

मुकदमे वापस लेने के ताजा फैसले से हजारों महिलाओं को राहत मिलेगी, जिनमें ज्यादातर गरीब और निम्न मध्य वर्ग की हैं। लेकिन महिला अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि अभी भी न्याय व्यवस्था के भीतर लिंग-भेदी भावनाएं गहराई तक पैठी हुई हैं, इसलिए महिलाओं के प्रजनन अधिकार की लड़ाई अभी मंजिल पर नहीं पहुंची है।

अर्जेंटीना में नया कानून 30 दिसंबर को पास हुआ था। इसके तहत गर्भावस्था के पहले 14 हफ्तों के दौरान गर्भपात कराने की इजाजत दी गई है। इस कानून के पारित होने के साथ ही अर्जेंटीना लैटिन अमेरिका में ऐसा प्रगतिशील कदम उठाने वाला पहला देश बन गया। इस कानून के पक्ष में माहौल बनाने के लिए महिला अधिकार कार्यकर्ता वर्षों से अभियान चला रही थीं।

पहले के कानून के तहत गर्भपात कराना जुर्म था, जिसके लिए कैद का प्रावधान था। इसके कारण महिलाओं को ज्यादती और हिंसा का सामना करना पड़ता था। तीन साल पहले एक ऐसा मामला सामने आया था, जिसमें एक महिला का स्वतः गर्भपात (मिसकैरिज) होने पर उसे तीन साल के लिए जेल भेज दिया गया। कोर्ट ने भी उस महिला की यह दलील नहीं सुनी कि उसे उस बात की सजा दी जा रही है, जिसमें उसका कोई हाथ नहीं है।

गर्भपात कराने वाली महिलाओं के साथ अर्जेंटीना का समाज अपमानजनक और कभी-कभी क्रूर व्यवहार भी करता रहा है। महिला अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि समाज का नजरिया बदलने में अभी वक्त लगेगा। लेकिन फिलहाल कानूनी राहत उनकी एक बड़ी जीत है। अभी ये साफ नहीं हुआ है कि मुकदमा उठाने के फैसले से कुल कितनी महिलाओं को फायदा होगा।

लेकिन कुछ समय पहले जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक पिछले आठ साल में 1,532 ऐसे मामले दर्ज हुए थे। ये रिपोर्ट मानव अधिकार संस्था- सेल्स, अबॉर्शन राइट्स कैंपनेर्स और सैन मार्टिन यूनिवर्सिटी सेंटर ने मिलकर तैयार की थी। लेकिन ये रिपोर्ट तैयार करने वाले कार्यकर्ताओं ने बताया था कि देश के कई राज्यों ने उनकी मांगी जानकारी उन्हें नहीं दी। इसलिए ये संख्या कहीं ज्यादा होने का अनुमान है।

अर्जेंटीना की महिला, लिंग और विविधता मामलों की मंत्री एलिजाबेथ गोमेज अल्कोर्ता ने ब्रिटिश अखबार द गार्जियन को बताया कि जिस किसी भी महिला पर गर्भपात के आरोप में मुकदमा चल रहा है, उन सबको इस फैसले का लाभ मिलेगा। इसकी वजह यह है कि संसद से पारित हुआ कानून अतीत की तारीख से लागू किया गया है। इस बीच महिला अधिकार कार्यकर्ताओँ ने मांग की है कि अब उन सभी मामलों की जांच कराई जानी चाहिए, जिनमें गर्भपात कराने के कारण किसी महिला की हत्या कर दिए जाने का आरोप लगा था।

उन महिलाओं को भी राहत देन की मांग की गई है, जिन्हें मृत बच्चे का जन्म देने (स्टिल बर्थ) या मिसकैरिज के कारण हत्या का दोषी ठहराया गया और जो इस कारण अभी भी जेल में हैं। अकसर ऐसे मामलों की शिकार गरीब घरों की महिलाएं बनी हैं। साथ ही गर्भपात की अवधि 14 हफ्तों से बढ़ाने की मांग की जा रही है। बहुत से देशों में 20 हफ्तों तक गर्भपात कराने की इजाजत मिली हुई है। इस मामले अर्जेंटीना की जेल मंत्री मारिया लाउरा गैरिगोस ने कहा कि यह मामला इस परिभाषा पर निर्भर करता है कि भ्रूण कब भ्रूण से आगे बढ़ जाता है। उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों में ज्यादातर कानून पुरुष बनाते हैं और जज भी पुरुष होते हैं। जबकि मुद्दा यह है कि महिलाएं अपने शरीर का क्या करें, यह फैसला करना उनका अधिकार होना चाहिए।

बेशक अभी भी अर्जंटीना में महिला अधिकार की लड़ाई अपनी मंजिल तक नहीं पहुंची है। लेकिन ताजा कानून और उसको लेकर चल रही बहस का संकेत है कि देश सही दिशा में है। अर्जेंटीना जैसे रूढ़िवादी देश के लिए इसे एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।


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